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Raskhan

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कविवर रसखान हिंदी साहित्य जगत् क्षेत्र में भक्ति काल के अंतिम प्रमुख कृष्णभक्त कवि और रीतिकालीन स्वच्छंद काव्यधारा के विशिष्ट कवि के रूप में प्रमुख माने जाते हैं। जन्मतः ही मुसलमान होते हुए भी हिंदुओं के आराध्य श्रीकृष्ण की भक्ति में आकंट तन-मन और धन से डूबना ही इनके काव्य की विशिष्ट विशेषता मानी जाती है।

रसखान के जीवन के संबंध में कोई ठोस प्रमाण हिंदी साहित्य में उपलब्ध नहीं होते फिर भी इनके जीवनवृत्त को अंतः साक्ष्य और बाह्य साक्ष्य के आधार पर माना गया है। आज तक प्राप्त तथ्यों, प्रमाणों एवं जनश्रुतियों के आधार पर यह कहा जाता है कि रसखान का जन्म 1533 ई. के लगभग हुआ था। इनका वास्तविक नाम ‘सैय्यद इब्राहिम’ था। वे जाति के पठान थे और दिल्ली के आसपास इनका निवास स्थान माना जाता है।

इनका जितना भी काव्य हिंदी साहित्य जगत को मिला है, वह एक अनुपम निधि के रूप में माना जाता हैं। क्योंकि उनकी कविता में भक्त हृदय की सच्ची अनुभूतियों का सरस एवं सुंदर चित्रण मिलता हैं। इसी कारण रसखान कृष्णभक्तों में सर्वोच्च स्थान के अधिकारी हैं। भक्त कवि रसखान का अंतर प्रेम ताप की दाहकता से पिघलकर विविध भाव-सरणियों में उमड़ा है। कवि की प्रेममयी उमंग के कारण ही इन्हें ‘रस की खान’ उपाधि दी गयी हैं। इनके काव्य का प्रमुख रस श्रृंगार रस माना गया है, और आलंबन श्रीकृष्ण को माना गया हैं। इसके अतिरिक्त ‘वात्सल्य रस’ का भी चरम परिपाक होता हुआ इनके काव्य में देखने को मिलता है। इनके काव्य में बालरूप की मनमोहक सांवली सलोनी मूरत मन को लुभाने वाली नज़र आती है। हिंदी साहित्य के इतिहास में रसखान की पहचान अन्य सभी कवियों से अलग रखते हैं। ऐसे महान भक्त के संबंध में विस्तृत जानकारी प्राप्त करना ही हमारा मूल प्रतिपाद्य विषय बन गया है ।

 

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