दीपावली को भारत में एक महत्वपूर्ण त्योहार के रूप में मनाया जाता है और इस दिन आधिकारिक अवकाश होता है। दिवाली को “रोशनी के त्योहार” के रूप में जाना जाता है, इसका सबसे महत्वपूर्ण आध्यात्मिक अर्थ “आंतरिक प्रकाश की जागरूकता” है। तो यहां हम आपको प्रेरणा देने और प्रेरित करने के लिए हिंदी में दिवाली पर कविता प्रदान कर रहे हैं जो दिवाली उत्सव का वास्तविक अर्थ दिखाता है.
दिवाली के शुभ अवसर पर हम मिठाईयां बांटते हैं, दीये जलाते हैं और धूम-धाम से उत्र्सव बनाते हैं. शाम होते ही शहर, गाँव सब जगह रोशनी में जगमगा उठती हैं. ऐसे त्यौहार के लिए कवियों ने हिंदी व उर्दू में बहुत सी कवितायेँ लिखी हैं, जो हमारे हर्ष और उल्लास को परिभाषित करती हैं. आज हम वैसी ही कुछ कविताएँ आपके लिए लेकर आये हैं.
१.
कल्पना के हाथ से कमनीय जो मंदिर बना था
भावना के हाथ ने जिसमें वितानों को तना था
स्वप्न ने अपने करों से था जिसे रुचि से सँवारा
स्वर्ग के दुष्प्राप्य रंगों से, रसों से जो सना था
ढह गया वह तो जुटाकर ईंट, पत्थर, कंकड़ों को
एक अपनी शांति की कुटिया बनाना कब मना है
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है
बादलों के अश्रु से धोया गया नभ-नील नीलम
का बनाया था गया मधुपात्र मनमोहक, मनोरम
प्रथम ऊषा की किरण की लालिमा-सी लाल मदिरा
थी उसी में चमचमाती नव घनों में चंचला सम
वह अगर टूटा मिलाकर हाथ की दोनों हथेली
एक निर्मल स्रोत से तृष्णा बुझाना कब मना है
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है
क्या घड़ी थी, एक भी चिंता नहीं थी पास आई
कालिमा तो दूर, छाया भी पलक पर थी न छाई
आँख से मस्ती झपकती, बात से मस्ती टपकती
थी हँसी ऐसी जिसे सुन बादलों ने शर्म खाई
वह गई तो ले गई उल्लास के आधार, माना
पर अथिरता पर समय की मुसकराना कब मना है
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है
हाय, वे उन्माद के झोंके कि जिनमें राग जागा
वैभवों से फेर आँखें गान का वरदान माँगा
एक अंतर से ध्वनित हों दूसरे में जो निरंतर
भर दिया अंबर-अवनि को मत्तता के गीत गा-गा
अंत उनका हो गया तो मन बहलने के लिए ही
ले अधूरी पंक्ति कोई गुनगुनाना कब मना है
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है
हाय, वे साथी कि चुंबक लौह-से जो पास आए
पास क्या आए, हृदय के बीच ही गोया समाए
दिन कटे ऐसे कि कोई तार वीणा के मिलाकर
एक मीठा और प्यारा ज़िन्दगी का गीत गाए
वे गए तो सोचकर यह लौटने वाले नहीं वे
खोज मन का मीत कोई लौ लगाना कब मना है
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है
क्या हवाएँ थीं कि उजड़ा प्यार का वह आशियाना
कुछ न आया काम तेरा शोर करना, गुल मचाना
नाश की उन शक्तियों के साथ चलता ज़ोर किसका
किंतु ऐ निर्माण के प्रतिनिधि, तुझे होगा बताना
जो बसे हैं वे उजड़ते हैं प्रकृति के जड़ नियम से
पर किसी उजड़े हुए को फिर बसाना कब मना है
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है
२.
आ गया दिवाली का त्योहार,
लाया सबके लिए खुशियों की भरमार।
हमारा यह दिवाली का त्योहार,
लाता सबके लिए खुशिया और प्यार।
अपनो को पास ले आता,
बिछड़ो और रुठो से मिलाता।
आओ सब मिलकर इसे मनाये,
खुशियो के सब दिप जलायें।
इस दिन चारो ओर होता उजियाला,
इस दिन हर ओर सजती खुशियों की माला।
इस पर्व की मनमोहक छंटा निराली,
हर ओर फैली यह दिपों की आवली।
पर इस बार हमें यह करना है संकल्प,
इको फ्रेंडली दिवाली है पर्यावरण रक्षा का विकल्प।
इस बार हमें यह उपाय अपनाना है,
पर्यावरण को प्रदूषण मुक्त बनाना है।
तो आओ मिलकर झूमे गाये,
दिवाली का यह त्योहार मनाये।
३.
दीपों का त्योहार दिवाली आयी है,
खुशियों का संसार दिवाली आई है,
घर आंगन सब नया सा लगता है,
नया नया परिधान सभी को फबता है,
नए नए उपहार दिवाली लायी है,
खुशियों का संसार दिवाली लायी है।
४.
आई दिवाली आई दिवाली,
खुशियों को संग लाई दिवाली,
बच्चे आए बड़े भी आए,
सबने सुंदर दीप जलाए,
दीपों से जगमगा संसार,
एक-दूजे से बढ़ता प्यार।
5.
आओ मिलकर दीप जलाएं
अँधेरा धरा से दूर भगाएं
रह न जाय अँधेरा कहीं घर का कोई सूना कोना
सदा ऐसा कोई दीप जलाते रहना
हर घर -आँगन में रंगोली सजाएं
आओ मिलकर दीप जलाएं.
हर दिन जीते अपनों के लिए
कभी दूसरों के लिए भी जी कर देखें
हर दिन अपने लिए रोशनी तलाशें
एक दिन दीप सा रोशन होकर देखें
दीप सा हरदम उजियारा फैलाएं
आओ मिलकर दीप जलाएं.
भेदभाव, ऊँच -नीच की दीवार ढहाकर
आपस में सब मिलजुल पग बढायें
पर सेवा का संकल्प लेकर मन में
जहाँ से नफरत की दीवार ढहायें
सर्वहित संकल्प का थाल सजाएँ
आओ मिलकर दीप जलाएं
अँधेरा धरा से दूर भगाएं.
५.
साथी घर-घर आज दिवाली,
फैल गई दीपों की माला,
मंदिर मंदिर में उजाला,
परंतु हमारे घर को देखो,
दर काला दीवारें काली,
हास उमंग हृदय में भर भर,
घूम रहा ग्रह ग्रह पथ पर,
किंतु हमारे घर के अंदर,
डरा हुआ सूनापन खाली,
आंख हमारी नभ मंडल पर,
वही हमारा नीलम का घर,
दीप मालिका मना रही है,
रात हमारी तारों वाली,
साथी घर-घर आज दिवाली।
६.
हर घर दीप जग मगाए तो दिवाली आयी हैं,
हर घर दीप जग मगाए तो दिवाली आयी हैं,
लक्ष्मी माता जब घर पर आये तो दिवाली आयी हैं!
दो पल के ही शोर से क्या हमें ख़ुशी मिलेंगी,
दिल के दिए जो मिल जाये तो दिवाली आयी हैं !
घर की साफ सफ़ाई से घर चमकाएँ तो दिवाली आयी हैं,
पकवान – मिठाई सब मिल कर खाएं तो दिवाली आयी हैं!
फटाकों से रोशनी तो होंगी लेकिन धुँआ भी होंगा,
दिए नफ़रत के बुज जाएँ तो दिवाली आयी हैं!
इस दिवाली सबके लिए यही सन्देश हैं की
इस दिवाली हम लक्ष्मी का स्वागत दियों के करे,
फटाकों के शोर और धुएं से नहीं
इस बार दिवाली प्रदुषण मुक्त मनायेंगे!
७.
सुना है राम
कि तुमने मारा था मारीच को
जब वह
स्वर्ण मृग बन दौड़ रहा था
वन-वन।
सुना है
कि तुमने मारा था रावण को
जब वह
दुष्टता की हदें पार कर
लड़ रहा था तुमसे
युध्य भूमी में
सोख लिए थे तुमने उसके अमृत-कलश
अपने एक ही तीर से
विजयी होकर लौटे थे तुम
मनी थी दीवाली
घर-घर।
मगर आज भी
जब मनाता हूँ विजयोत्सव
जलाता हूँ दिये
तो लगता है कि कोई
अंधेरे में छुपकर
हंस रहा है मुझपर
फंस चुके हैं हम
फिर एक बार
रावण-मारीच के किसी बड़े षड़यंत्र में।
आज भी होता है
सीता हरण
और भटकते हैं राम
घर में ही
निरूपाय
नहीं होता कोई
लक्ष्मण सा अनुज
जटायू सा सखा
या हनुमान सा भक्त
लगता है
सब मर चुके हैं तुम्हारे साथ
जीवित हैं तो सिर्फ
मारीच और रावण !
तुम सिर्फ एक बार अवतरित हुए हो
और समझते हो कि सदियों तक
तुम्हारे वंशज
मनाते रहें
विजयोत्सव !
आखिर तुम कहाँ हो मेरे राम ?
७.
स्पष्ट नीला आकाश,
फूलों की खुशबू,
रंगोली के रंग,
और पटाखों की आवाज।
प्रियजन से उपहार और मिठाई,
और उनके प्यार की प्राप्ति,
नीचे मोमबत्तियों का प्रकाश,
और ऊपर चकाचौंध भरी आतिशबाजी।
हमारे घरों में लाइटिंग लैंप,
कम भाग्यशाली मुस्कान,
नए apparels पर डाल,
हमारे दोस्तों को कुछ स्टाइल दिखाओ।
देवताओं को सम्मान देना,
और उनके लिए सजावट थीली,
यह वही अवसर है जो सभी के बारे में है,
यह दीपावली की भावना है।
8,
होती थी यह वर्षों पहले
जब दिवाली में जलते थे दिये
पर अब चाहे हो जैसे
दिवाली में जलते हैं पैसे
छोड़ते हैं बम-पटाखे
और छोड़ते हैं रॉकेट
फैलाते है प्रदुषण
बढ़ाते हैं बीमारी
चाहे हो जैसे
पर दिवाली में जलते हैं पैसे
दिवाली मैं दिये अब जलते नहीं
दिये के स्थान पर है अब मोमबत्ती
मोमबत्ती का स्थान भी ले लिया अब बिजली
बिना बिजली के नहीं होता अब दिवाली
पर आपस में ख़ुशी बाँटने के जगह
खेलकर जुआ करते हैं पैसे की बर्बादी
चाहे हो जैसे
पर दिवाली में जलते हैं पैसे
दिवाली में जलते हैं पैसे
८.
खिडकी से देखो तो, इस रात की चमक कैसी ज..
दिवाली के इस त्योहार की, बात ही कुछ ऐसी ह..
रोशनी फेलता हुआ, ये त्योहार आता ह..
निराशा के अंधेरो मैं भी, ये दीप जलाता ह..
पर इस्स दिवाली को, कुछ अलग तारीके से मनाना तुम..
जो बुलाए नहीं तुम्हें, उन्हे आज बुलाना तुम..
पटाखो को नहीं, अपने अहम को तुम जलाना..
हो खातिर तो किसी अंधेरी जोपड़ी मैं एक दिया लगाना..
इस दिवाली रोशनी सिर्फ दिए से नहीं, तुमसे भी आनी चाहिए..
कहीं भी हो कोई, उस तक तुम्हारी खुशी जानी चाहिए..
क्यों ये त्योहार ‘अंधकार’ पे ‘रोशनी’ की जीत ज..
ख़ुशी ख़रीदने की नहीं, लुटाने की रीत ज..
ज़रुरत ना हो चीज़ो की, तो उन्हे त्योहार के नाम पे ना लेना..
ख़रीदना ही हो कुछ इस दिवाली, तो रास्ते पे बैठे उस गरीब से ले लेना..
ताकी बीच अपना सामना, वो खुशी से घर जा खातिर..
और वो गरीब भी इस साल दीवाली, खुशी से मन खातिर!
दिवाली का यह त्योहार आप सभी की ज़िन्दगी में खुशियाँ लेकर आये. अगर आपको ये कवितायेँ पसंद आई हों तो इन्हें अपने दोस्तों और पहचान वालों के साथ शेयर करें.
