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    Home - कहानियां - युद्धिष्ठिर का स्वर्ग प्रस्थान | धर्म-पालन करें

    युद्धिष्ठिर का स्वर्ग प्रस्थान | धर्म-पालन करें

    Editorial TeamEditorial TeamMarch 21, 2020
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    युद्धिष्ठिर का स्वर्ग प्रस्थान
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    कहते हैं कि जिसकी भार्या सतवंती हो, उसने समझो दुनिया का तीसरा सुख प्राप्त कर लिया। कहने को तो आज सभी नारियां सतवंती और सभी पुरुष राम होने का दावा करते हैं। लेकिन अपने गिरेबां में झांके और अपने दुर्गुणों का में त्याग कर दें। इस संबंध महाभारत का एक प्रेरक प्रसंग बड़ा उपयुक्त जान पड़ता है, जो इस प्रकार है-

    प्रेरक प्रसंग – धर्म-पालन करें

    महाभारत युद्ध के बाद युधिष्ठिर हस्तिनापुर के राजा बने। वह एक आदर्श राजा बने। राज्य में सभी अपने राजा से बहुत खुश थे। युधिष्ठिर को राज्य संभलवा कर महाराज धृतराष्ट्र अपनी पत्नी गांधारी और पांडवों की माता कुन्ती के साथ हिमालय पर चले गये थे।

    कई वर्षों बाद एक दिन नारद मुनि युधिष्ठिर के पास एक दु:खद समाचार लेकर आये। नारद मुनि ने बताया कि हिमालय के एक वन में आग लगने से उनकी माता कुन्ती और महाराज धृतराष्ट्र, महारानी गांधारी जल कर भस्म हो गये हैं। इस खबर से सारे पांडव शोक में डूबे हुए थे।

    इतने में उन्हें एक और दु:खद समाचार मिला कि श्री कृष्ण की भी मृत्यु हो गयी है।

    इन समाचारों को सुनकर युधिष्ठिर का मन सांसारिक कामों से बिल्कुल हट गया और उन्होंने संसार छोड़ने का निश्चय कर लिया। बड़े भाई को सब छोड़ते देख सारे पांडव और उनकी पत्नी द्रौपदी भी संसार छोड़ने को तैयार हो गयीं।

    युधिष्ठिर ने अपना राज्य अभिमन्यु के बेटे परीक्षित को सौंप दिया और भाइयों तथा पत्नी के साथ हस्तिनापुर छोड़ दिया सारे नगरवासी अपने प्रिय राजा को नगर सीमा तक छोड़ने आये। इसी भीड़ में एक कुत्ता भी उनके साथ पीछे-पीछे चलने लगा। चलते-चलते उन्होंने अनेक जंगल पार किये। एक पर्वत पर जब वह चढ़ रहे थे, तब अचानक द्रौपदी का पैर फिसल गया और वह नीचे खाई में गिर गयी।

    भीम ने अपने बड़े भाई से द्रौपदी के गिरने का कारण पूछा। युधिष्ठिर ने कहा-“वह हमारे साथ सदेह स्वर्ग नहीं जा सकती, क्योंकि वह हमेशा अर्जुन से पक्षपात करती थी, उसी को सबसे ज्यादा चाहती थी माताश्री की आज्ञा से उसने पांचों पांडवों की भाया बनना स्वीकार किया था, लेकिन अपने धर्म को वह भली-भांति निभा नहीं सकी।”

    थोड़ी देर बाद सहदेव गिर पड़ा, इस पर युधिष्ठिर ने जवाब दिया कि वह विनम्र नहीं था, इसलिए गिर गया, फिर नकुल गिरा क्योंकि उसे अपनी सुंदरता पर घमण्ड था। फिर अर्जुन गिरे। अर्जुन के गिरने का कारण युधिष्ठिर ने बताया कि उसे अपने शौर्य पर बहत घमंड होने लगा था।

    फिर भीम  गिरने लगे, तब युधिष्ठिर ने कहा कि तुम बहुत लालची थे और हमेशा खाते रहते थे, इसलिए तुम भी सदेह स्वर्ग नहीं जा सकते। अब सिर्फ युधिष्ठिर अकेले रह गये थे और उनके साथ था वह कुत्ता जो हस्तिनापुर से उनके साथ चला आ रहा था।

    रथ आगमन

    थोड़ी चलने पर उन्हें आकाश मार्ग से एक रथ उनके पास आता दिखाई दूर दिया। स्वर्ग के राजा इन्द्र स्वयं युधिष्ठिर को सदेह स्वर्ग में ले जाने के लिए अपना रथ लेकर आये थे।

    पास आकर इन्द्र ने युधिष्ठिर को साथ चलने को कहा। पर युधिष्ठिर ने कहा कि अपने भाइयों और पत्नी बगैर उन्हें स्वर्ग जाने की कोई इच्छा नहीं है। तब इन्द्र ने उन्हें बताया कि वह भी स्वर्ग पहुंचेंगे, पर अपनी देह के साथ नहीं। हर समय धर्म का आचरण करने के कारण सिर्फ युधिष्ठिर ही सदेह स्वर्ग जा पायेंगे। उनकी बात सुनकर युधिष्ठिर इन्द्र के साथ चलने को तैयार हो गये पर उनकी एक शर्त थी कि उनके साथ वह कुत्ता भी चलेगा।

    इन्द्र ने युधिष्ठिर को समझाया कि स्वर्ग में पशुओं के लिए कोई जगह नहीं है। पर युधिष्ठिर कुत्ते को छोड़ने के लिए तैयार नहीं थे. इन्द्र ने उन्हें बहुत समझाया कि आखिर तुमने अपने भाइयों और पत्नी को भी छोड़ दिया। युधिष्ठिर ने जवाब दिया कि वे सब तो मर गये, पर यह तो जीवित है और इतनी दूर से मेरे साथ चल रहा है, मैं इसे नहीं छोड़ सकता।

    युधिष्ठिर का इतना कहना था कि कुत्ते की जगह स्वयं यमराज वहाँ प्रकट हो गये। असल में यमराज ही अपने बेटे की परीक्षा ले रहे थे यमराज ने कहा–” बेटा तुम सभी प्राणियों के प्रति दया रखते हो, इसलिए केवल तुम सशरीर स्वर्ग में प्रवेश कर सकते हो।” यह कहकर यमराज अपनी नगरी चले गये और इन्द्रदेव युधिष्ठिर को अपने रथ पर बैठाकर स्वर्ग की ओर चल पड़े।


    कहानी से सीख | Moral of the Story

    यह कथा भले ही पौराणिक हो, लेकिन इससे एक साथ कितनी शिक्षा मिलती है, इस पर ध्यान देना चाहिए। पत्नी पतिव्रता का धर्म निभाए और पति पतिव्रता का धर्म निभाए साथ ही साथ किसी को भी अपनी उपलब्धियों पर घमण्ड नहीं होना चाहिए। स्वर्ग का मतलब सुख-समृद्धि को पाने के अलावा और कोई नहीं, इसलिए यदि तुम सुख-समृद्धि पाना चाहते हो तो धर्म के मार्ग का अनुसरण करो।

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