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Hindi Kahaniya (Bachchon Ki Kahaniyan)

दोस्तों, यहाँ पर मजेदार और रोचक हिंदी कहानियाँ (Hindi Kahaniya) दी जा रही हैं जिनको पढ़कर या सुनकर बच्चे अपनी कल्पना शक्ति मजबूत कर सकते हैं. यह उनके दिमागी विकास के लिए सबसे उत्तम जरिया हैं.

8 Majedaar Hindi Kahaniya

Bachchon Ki Kahaniyan

Hindi Kahani #1 – मुन्ना हुदहुद की जूती

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Bachchon ki Kahaniyan – जूती

अब पहले हम तुम्हें यह बताएं कि उनों मुन्ना हुदहुद क्यों कहा जाता था। मुन्ना उनका प्यार का नाम था। मां-बाप बहुत चाहते थे उसे. बचपन में वही नाम हमेशा के लिए पड़ गया। और यह हुदहुद? हुदहुद एक चिड़िया होती है, जो मियां मुन्ना को बचपन से ही बहुत पसंद थी। पिंजड़े में कई हुदहुद पाल रखी थीं। बड़े होने पर भी हुदहुद की बोली खुद अपने मुंह से निकालते थे। कुल मिलाकर नाम पड़ गया मुन्ना हुदहुद ।

अब मुन्ना हुदहुद बाल-बच्चेदार हैं। लगभग हमारी ही उम्र के हैं। हमसे पटती भी खूब है। जब-जब हम उनके घर गए, खूब खातिर की। एक दिन संध्या समय शतरंज खेलने हम उनके वहां पहुंचे। आज कुछ अलग ही दृश्य देखा। मुन्ना हुदहुद नंगे बदन, तहमद पहने, पंखे के नीचे बैठे थे। पास में कई फीते, पटरियां और जामेट्री बाक्स रखा हुआ था। मुन्ना हुदहुद परकार और पेंसिल से निशान लगाकर अपना पैर नाप रहे थे। हमें देखकर बोले “आइए, आइए! हम जरा अपना पैर नाप रहे हैं।”

मगर क्यों? क्या पैर के नाप का बक्सा बनवा रहे है? या अपना पैर भी हुदहुद की तरह पिंजड़े में पालेंगे?”

“भाई आप तो निरे बेवकूफ हैं। इतना भी नहीं समझते कि हमें अपने पैर का जूता बनवाना है। शहर में एक जूता बनाने वाला आया हुआ है। उसे अपने पैर का नाप देना है।”

“मगर आपका जूता तो बिल्कुल नया और चमचमाता हुआ है, फिर क्या जरूरत आ पड़ी?”

“आप इसे जूता कहते हैं? यह देखिए इनका पूरब और पश्चिम अलग-अलग है।” इतना कहकर मुन्ना हुदहुद ने धीरे से खींचकर जूते का सोल और ऊपरी हिस्सा अलग-अलग कर दिया। नए जूते की यह हालत देखकर हमें भी हंसी आ गई।

हुदहुद बोले, “यार, यह जूता एकदम बेकार है। हम दफ्तर पहुंच जाते हैं तब पता लगता है कि जूते का सोल सदर बाजार में ही पड़ा है। दोबारा वापस जाना पड़ता है। बड़े साहब के कमरे से फाइल पर दस्तखत कराकर लौटते हैं तो चपरासी जूते का सोल पीछे-पीछे प्लेट में लेकर आता है कि वहीं छूट गया था। आप इसे जूता कहते है?”

मुन्ना हुदहुद के इस दुख पर मुझे भी तरस आ गया तभी वह लेटकर पेट के बल अपनी चारपाई के नीचे रेंग गए और एक पुरानी संदूकची घसीट लाए। उस पर से धूल-धक्कड़ झाड़कर बोले, “पहले इसे नमस्ते करो। यह हमारा खानदानी म्यूजियम (संग्रहालय) है। बड़ी मेहनत और लगन से जुटा पाए है।

हमने सिर झुकाकर संदूकची को नमस्ते बोल दी। मगर जैसे ही हुदहुद ने संदूकची खोली, हमने अपना और हुदहुद का सिर एक साथ पीट लिया। संदूकची में पुराने और हर साइज के जूते भरे पड़े थे।

हुदहुद ने बड़े प्यार से एक नन्ही-मुन्नी जूती निकाली और अपने कुर्ते से साफ करते हुए चूमकर बोले, “इस संदूकची में हमारी सब यादगार जूतियां हैं। यह वह जूती है जो हम छह महीने की उम्र में पहना करते थे। इसे पहनकर झूले में पड़े-पड़े अपनी जूती, मेरा मतलब अपना अंगूठा चूसते रहते थे फिर स्कूल गए और फिर कालेज। फिर क्रिकेट खेला और फिर शादी हुई। हर मौके, हर उम्र की एक एक जूती मौजूद है। हर जूती के तल्ले पर उसके खरीदे जाने और फट जाने की तारीख लिखी है।”

हुदहुद ने बड़ी सावधानी से अपना जूटी संग्रहालय बन्द किया और दोबारा पेट के बल लेटकर चारपाई तले छिपा आए। बाहए निकल कर बोले, “मेरे दोस्त! मुझे जीवनभर न खाने का शौक रहा, न पहनने का। सिर्फ जूतों का शौक रहा। पतलून भले ही बीमार और तार-तार रही मेरी, मगर जूती हमेशा चमचमाती रही अब मुझे नया जूता बनवाना है।”

मैंने हुदहुद को समझा दिया कि शहर की एक बहुत बड़ी जूतों की दुकान में मेरी जान-पहचान है। मैं उन्हें बेहतरीन जूता दिला सकता हूं।

इतना सुनना था कि हुदहुद ने उचककर पतलून-शर्ट पहनी और जूता पैर में डालकर मेरे साथ हो लिए। हम दोनों दुकान पर जा पहुंचे और हुदहुद के नाप का जूता निकाला जाने लगा। हुदहुद का पांव ही कुछ ऐसा कुदरती टेढ़ा -मेढ़ा था कि कोई जूता बड़ा निकलता और कोई पांव में कस जाता।

एक जूता तो इतना कस गया कि दुकान के कई कर्मचारियों ने पूरी ताकत लगाकर उनके पैर से घसीटा। सब डर रहे थे कि कहीं हुदहुद की टांग न अलग हो जाए। हुदहुद के सामने जूतों का ढेर लग गया था। तभी अचानक हुदहुद चीखे, मिल गया। यह साइज एकदम ठीक है।”

हम सब का हसी के मारे बुरा हाल था। देखते क्या है कि हुदहुद जूते के डिब्बे में पांव डाले बैठे हैं। मुझे भी शरारत सूझी और कहा, “इन्हें एक डिब्बा और दे दीजिए। कुछ दिन डिब्बा पहनकर ही काम चला लेंगे।”

तभी दुकान के मालिक ने हुदहुद से कहा कि अब कल आइएगा। साढ़े आठ बज चुके थे और नियमानुसार दुकान बंद करनी थी। हुदहुद झुंझलाए हुए मेरे साथ बाहर निकल आए और दुकान का शटर गिर गया।

थोड़ी दूर चलकर हुदहुद घबराकर बोले, “अरे! मैंने तो अपना पुराना जूता भी दुकान के अंदर ही छोड़ दिया। फौरन वापस चलो।” हुदहुद सचमुच नंगे पैर चल रहे थे। मैंने वापस जाकर शटर थपथपाया। दुकान के एक नौकर ने थोड़ा सा शटर ऊपर उठाया और कछुए की तरह जरा-सी गर्दन बाहर निकालकर बोला, “कहिए।” भाई, हम जो जूते पहनकर आए थे, उन्हें भी अन्दर भूल आए हैं।

जरा बाहर फिकवा दीजिए। “अब तो मुश्किल है मैंने वे जूते भी डिब्बे में बन्द करके ऊपर लगा दिए। सारे डिब्बे एक जैसे हैं। अब हजारों डिब्बों में उन्हें ढूंढना आसान नहीं है। दुकान बंद हो चुकी है? कल आइएगा ले जाइएगा।” इतना कहकर उसने शटर बंद कर दिया।

हुदहुद बेचारे परेशान कि अब नंगे पैर घर कैसे जाए? कोई मामूली चप्पल खरीदना उनकी शान के खिलाफ था। सो उन्होंने पैंट जरा नीचे खिसका कर पांव ढक
लिए और अपने पैर कांपते हुए धीरे-धीरे घर लौट आए।

अगले दिन देखता क्या हूं कि हुदहुद बढ़िया सूट और टाई के साथ लकड़ी के खड़ाऊं पहने आफिस से लौट रहे हैं। मेरे पूछने से पहले ही बोले, “अब ठीक है, दोस्त। यह काफी मजबूत चीज़ है। इसका सोल भी अलग नहीं होता।”

और वे खटर-पटर करते तेजी से आगे बढ़ गए। सुना है कि उनका नया जूता कई ऊंचे कारीगर मिलकर बनाने में लगे हुए हैं।

~ के पी सक्सेना

Bachchon Ki Kahaniyan #2 – तैंतीस गधे

33 gadhe hindi kahaniya
Hindi Kahaniya- 33 गधे

जैसा कि सबके बचपन में होता है कि वे पहली-पहली बार कोई नई चीज या प्राणी देखते हैं तो मन में जिज्ञासा होती है कि उसके बारे में अधिक से अधिक जानें।

पिताजी ने मेरे स्कूल जाने लायक उम्र होने से पहले चित्रों वाली एक पुस्तक लाकर दी, इस इच्छा के साथ कि राजा बेटा चित्रों के साथ-साथ अक्षर ज्ञान भी करे।

मैं उस रंग-बिरंगी पुस्तक को बहुत ध्यान से देखता। माँ घर का काम-काज निबटा कर दोपहर में आराम करती तो मैं भी अपनी पुस्तक लेकर पास बैठ जाता। माँ चित्रों पर अंगुली रखकर पूछती, “यह क्या है?”

“कबू” मैं फौरन जवाब देता।

“यह क्या है?” ची-ची मैं बताता। और यह… “चूहा… यह घोला और यह.. मैं इस चित्र पर अटक जाता और फिर कुछ रुक कर जवाब देता जे भी घोला है!”

“नहीं बेटे, यह गधा है अब बताओं क्या है?”गधा! मैं बताता। माँ संतुष्ट होती कि राजा बेटा घोड़ा और गधा में फर्क जानने की चेष्टा करने लगा है।

एक दिन जब घर की टूट-फूट सुधारने के लिए चूने-पत्थर और बजरी रेत से लदे-फदे, सफेद-काले, चार पैरों वाले आठ-दस जानवरों को हाकता हुआ एक आदमी आंगन तक चला आया तो मैं चिल्लाया, “माँ …मां, देखो गधे” में उस दिन बहुत खुश हुई और मैं भी, इसलिए कि मैंने गधों को सही-सही पहचान लिया था।

फिर स्कूल जाने का मौसम आया। हमारी टीचर दीदी बहुत अच्छी थीं। वे हमें प्रतिदिन कहानी सुनाती थीं। एक दिन उन्होंने हमें धोबी और गधा नाम की कहानी सुनाई। इस कहानी से मुझे गधे के बारे में और भी बहुत कुछ मालूम हुआ। गधा बोझा ढोता है। गधा बेचारा होता है। गधा सीधा-सादा होता है। गधा धोबी के डंडे खाता है। और गधा, गधा ही होता है।

टीचर दीदी से कहानियां सुनते, टॉफी-बिस्किट खाते-खाते मैं पांचवी कक्षा में आ गया।

एक दिन गणित के मास्टर जी ने कक्षा में कुछ बच्चों को शरारत करने पर डाँटा और अतिम वाक्य में ‘गधे कहीं के’ कह कर अपनी बात पूरी की। मेरी आखें चौड़ी हो गई। “यह क्या, मास्टरजी की तबीयत तो ठीक है न! आखें तो कमजोर नहीं हो गई, जो उन्होंने बच्चों को ‘गधे कहीं के’ कहा। जब वे चले गए तो मैने उन सभी बच्चो को छूकर देखा। वे तो वैसे ही लगे जैसे पहले थे। कहीं कोई बदलाव नही.. तो फिर मास्टरजी ने ऐसा क्यूं कहा? मुझे उत्सुकता हुई। पर किससे
पूछता? पता नहीं कोई क्या सोचता।”

एक दिन उन्होंने कक्षा में आते ही घोषणा की, “ध्यान से सुनो। मैं कल से चार दिन की छुट्टी पर रहूगा। मैं तुम्हें कुछ काम देकर जा रहा हूं। आकर सबकी कॉपियां जांचूगा। और उन्होंने कुछ की बजाय देर सारा काम दे डाला।

हम काम को तो उनके जाने के तुरन्त बाद ही भूल गए और खुशियां मनाने लगे। हम उनके पीरियड में खूब मजे करते। पता ही नहीं चला कि कब पांचवा दिन आ गया। मास्टरजी ने कक्षा में आते ही पहली बात यही कही, अपनी-अपनी कॉपिया यहाँ मेज पर रख दो।”

पूरी कक्षा में सिर्फ दो ही बच्चों ने उनका दिया काम किया था सो वे लपक कर गए और मेज पर अपनी कॉपियां रख आए। बाकी बच्चे मन ही मन बहाने सोचने लगे। “बस दो ही कॉपिया? बाकी किसी ने काम नहीं किया? “पूरी कक्षा चुप! “मैं पूछता हूं, आखिर चार दिन तक तुमने किया क्या? बोलो,
जवाब दो।”

जब कोई नहीं बोला तो उनको ताव आ गया ये बाहर की ओर लपके। मैंने खिड़की से झांका। वे कक्षा के बाहर ही लगे नीम के पेड़ पर लटकी एक डाली को तोड़ने के लिए उछल रहे थे मैंने अपने पड़ोसी को बताया। पड़ोसी ने अपने पड़ोसी को और पूरी कक्षा में यह खबर फैल गई कि मास्टरजी नीम की डाली तोड़कर ला रहे हैं। आखिर वे नीम की डाली तोड़ने में सफल हो गए। हम सबके नन्हें-नन्हें दिल तेजी से धड़कने लगे। “उफ! कितना कड़वा होता है नीम और उसकी मार..

“अभी पता चल जाएगा कि काम न करके लाने की सजा क्या है!” मास्टरजी डाली लहराते हुए बोले। और पल भर बाद ही नीम हम पर बरस रहा था, गरज रहा था। सड़ाक! सड़ाक!! सड़ाक!!! साथ ही मास्टरजी की पतली आवाज़ भी गूंज रही थी, “नालायक काम नहीं करते। मटरगश्ती करते हैं। गधे कहीं के! सड़ाक! गधे कहीं के! सड़ाक गधे कहीं के..!”

मास्टरजी ने तैंतीस बार तो ‘गधे कहीं के’ कहा ही होगा। बाकी दो ने काम किया था सो वे बच गए। वरना वे भी हमारी सी हालत में होते और कक्षा पांच में पूरे पैंतीस गधे होते।

मारपीट मचाकर मास्टरजी ने हाथ में बचा रह गया डाली का टुकड़ा कक्षा के बाहर फेंक दिया। अब वे हमें डाँट रहे थे – “तुम्हें शर्म आनी चाहिए। केवल दो बच्चों ने ही काम किया है, कुछ सीखो इनसे गधों!”

वे दो बच्चे भी दुःखी थे और हम तैतीस बच्चे भी। हमारी पीड़ा यह थी कि हमारे बीच दो ऐसे प्राणी है जिन्होंने काम किया है, और वे गधे नहीं हैं उन दोनों की पीड़ा यह थी कि वे तैंतीस गधों के बीच बैठे हैं।

इस घटना के बाद तो हमारे लिए यह कोई नई बात नहीं थी। हमारे कान “गधे कहीं के” सुन-सुन कर पक चुके थे।

छठी कक्षा में मास्टर कृपालु दयाल हमें हिन्दी पढ़ाते थे। उनका सिर्फ नाम ही कृपालु दयाल था। लेकिन वे हद दर्जे के कठोर थे। स्वभाव से क्रूर क्रूर दयाल! उनका एक वाक्य था “हम तुम्हारी इतनी मरम्मत करें कि तुम याद रखो। उनके कक्षा में आते ही हम सबकी घिग्घी बंध जाती थी। पैंतालिस मिनट का पीरियड पैंतालीस घंटे का लगता था।

उनके आने से पहले भले ही हमने भरपेट पानी पीया हो लेकिन कक्षा में उनके कदम रखते ही गला सूख जाता था। वे जब पीटते थे तो उनकी जुबान से यह वाक्य, हम तुम्हारी इतनी मरम्मत करें कि तुम याद रखो।” बराबर फिसलता रहता था। उनके हाथ और जुबान एक साथ अपना कर्तव्य पूरा करते थे।

कुछ दिन बाद उन्होंने जाने किससे प्रेरणा पाकर अपने वाक्य में संशोधन कर लिया था। अब वे कहते, “हम तुम्हें इतना मारें कि तुम गधे
बन जाओ। एक दिन उन्होंने कुछ शब्दों के पर्यायवाची लिखकर लाने को कहा। उनमें से एक शब्द था “गधा”। मैंने अपनी कॉपी में लिखा, गधा खर, गर्दभ, रासभ और हम बच्चे।

दूसरे दिन जब उन्होंने कॉपियां जांची तो मेरी कॉपी पढ़कर चौंके। फिर मुझसे बोले, इधर आओ।” मैं थर-थर कापता हुआ उनके पास खड़ा हो गया। यह क्या लिखा है- “हम बच्चे? है भई, क्या मतलब है इसका?” उन्होंने पूछा।

जाने कैसे मेरे मुंह से निकला. “आप कहते हैं और गणित के मास्टरजी भी कहते हैं। हालांकि मैं डर रहा था कि अब मेरी खैर नहीं। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। मेरी पीठ पर हाथ फेरते हुए बोले, “जाओ, अपनी जगह जाकर बैठ जाओ।”

मुझे उनका यह स्वर बहुत नरम लगा शायद उन्हें लगा होगा कि वे राष्ट्र निर्माता हैं उन्हें हम बच्चों को सुनागरिक बनाना है, गधा नहीं।

उसके बाद जहां तक मेरी जानकारी है, उन्होंने किसी भी बच्चे को गधा नहीं कहा, न गधे की तरह हमने उनसे मार खाई। सचमुच अब वे कृपालु दयाल का ही अवतार बन गए थे।

~ सुधीर सक्सेना

Hindi Kahaniya #3 – गहनों का पेड़

जंगल के बीच पगडंडी के किनारे पीपल का एक विशाल पेड़ था जो सोने-चाँदी के गहनों से लदा हुआ था। उसे देखकर लगता था जैसे पेड़ पर पत्तों की बजाए सोने-चाँदी के गहने उगते हों।

यह पेड़ ऐसी जगह पर था, जहां से लोग एक से दूसरे गांव जाया करते थे। जो भी वहां से गुजरता, सोने-चाँदी के पेड़ को देखकर स्तब्ध रह जाता। गहने इतने डिज़ाइन के थे कि लोग किसी सुनार के पास जाने की बजाए वहां आकर अपनी पसंद की डिज़ाइन चुन लें, पर इस पेड़ पर गहने उगते थे, ऐसा नहीं था। यह काम तो कुछ लुटेरों का था।

लुटेरे भी बड़े अद्भुत ढंग से अपना काम करते थे। उस रास्ते से जो भी लोग गुजरते, वे लुटेरे उन्हें डरा देते कि आगे डाकू रहते हैं जो उनके गहने लूट लेंगे। वे चाहें तो अपने गहने इस पेड़ पर टांग सकते है और वापसी में उन्हें उतार सकते हैं। इस पेड़ पर सभी लोगों के गहने सुरक्षित रहते हैं, ऐसा पीपल का वरदान है। –

भोले-भाले ग्रामीण उनकी बातों में आकर अपने गहने उन्हें सौप देते। ऐसा भी नहीं था कि उन्हें अपने गहने वापिस न मिलते हों। सबको वापिसी में अपने-अपने गहने मिल जाते थे। अपने गहने वापिस पाकर लोग खुश होते कितु उन लुटेरों की चाल अलग थी। जब भी स्त्रिया-पुरुष अपने गहने उतारकर उन्हें सौंपते तो वे तुरत शहर जाकर उन गहनों की ऊपरी परत छोड़कर अंदर का सारा सोना निकाल कर पीतल भरवा देते। गहनों का भार वही रहता। अतः किसी को कोई शक न होता।

एक बार एक औरत जो इसी रास्ते से वापिस आई थी, उसे अपने गहने बेचने पड़े। बात यह हुई कि उसकी बेटी की शादी तय हो गई बेटी के गहने तो उसने पहले से ही बनवा रखे थे पर धन की कमी हो जाने के कारण औरत अपने गहने बेचने सुनार के पास गई। पर सुनार ने उसे उन गहनों के बहुत कम पैसे दिए। उसने कहा कि गहनों में पीतल भरा है। वह चुपचाप पैसे लेकर घर आ गई और अपने पति को बताया। उसके पति ने उल्टे उसी के मायके वालों को कोसना शुरू कर दिया कि उन्होंने खोटे गहने दिए हैं। किसी को असली बात समझ न आई।

फिर वह अपने गहने बेचने गया तो सुनार ने उसके गहनों में भी पीतल भरा बताया। तब उन्हें कुछ शक हुआ। वे तुरंत उन लोगों के पास गए जो उस दिन उनके साथ दूसरे गांव की शादी में सम्मिलित होने के लिए गए थे और उन सबने अपने गहने पेड़ पर टांगे थे उन सबके गहनों में भी इसी तरह का खोट निकला। तब असली बात उनकी समझ में आई।

उन सबने मिलकर निकट के शहर के थाने में इस घटना की सूचना दी। पुलिस ने छापा मारा और लुटेरों को गहनों समेत गिरफ्तार कर लिया। पुरस्कार रूप में उस ग्रामीण दंपत्ति को इतना धन मिल गया कि उनकी बेटी की शादी बड़ी आसानी से हो गई और उन्हें अपने असली गहने भी मिल गए। पीपल का वह पेड़ भी उन कृत्रिम गहनों से छुटकारा पाकर अपने असली प्राकृतिक रूप को पाकर बहुत खुश हुआ।

~ मोनी शंकर

Hindi Kahani #4 – अब काहे के सौ

किसी गांव में भोला नाम का एक लड़का रहता था। घर में वह और उसकी मां केवल दो प्राणी थे। पिता, उसके बचपन में ही चल बसे थे। भोला गरीबी के कारण स्कूल नहीं जा सका। कमाने के लिए वह एक सेठ के यहां नौकरी करने लगा। नाम के अनुसार ही वह भोला-भाला था। सेठ उसे समय समय पर ठगता रहता था। कम रुपए देता व काम ज्यादा लेता। भोला दुःखी रहता था।

किसी तरह उसे पता चला कि उसके गांव में साक्षरता कक्षा चल रही है। वह वहां पढ़ने जाने लगा। जल्दी ही वह हिसाब लगाने लगा। रुपयों पैसों का हिसाब वह अंगुलियों पर गिनकर कर लेता उसने सेठजी से बदला लेने की सोची।

एक दिन उसने सेठ से सौ रुपए उधार मागे और काम छोड़कर चला गया।

काफी दिन तक वह सेठ के पास नहीं आया। सेठ तो था कंजूस। वह सौ रुपयों के बारे में सोच सोचकर परेशान रहता।

एक दिन रास्ते में भोला मिला। सेठ ने भोला से कहा, भोला, कुछ दिन पहले तुमने मुझसे सौ रुपए उधार लिए थे वह लौटा दो।” भोला ने आंखे मटकाते हुए कहा, “कौन से रुपए सेठ जी? वह तो कब के खर्च हो गए। सेठजी ने कहा, “किसमें खर्च हुए।”

भोला ने कहा, “सुनो सेठजी। मैं सारा हिसाब बताता हूं।”

दस के ले लिए आजरा-बाजरा, दस के ले लिए जौ, सेठजी अब काहै के सौ।”

इतना सुनते ही सेठजी अवाक् रह गए । वह झल्लाते हुए बोले “अरे अस्सी ही दे दो।”

भोला फिर मुस्कराते हुए बोला, “दस की ले ली लोटा बाल्टी दस की ले ली रस्सी, सेठजी अब काहे के अस्सी।”

सेठजी भोला की बातें सुनकर मन ही मन तिलमिला रहे थे गुस्से में उनका बुरा हाल था। वह बोले “साठ ही दे दो।”

भोला फिर आंखें मटकाते हुए बोला, “सुनो सेठ जी, दस के ले लिए इस्तर विस्तर, दस की ले ली खाट, सेठजी अब काहे के साठ।

सेठजी का बुरा हाल था। वह फिर बोले”भोला, कम से कम मेरे चालीस रुपए ही दे दो।”

भोला फिर बोला, “दस की ले ली जूता चप्पल, दस की ले ली पॉलिस, सेठजी अब काहे के चालीस।”

सेठ के पसीना छूट रहा था। वह बोले “कम से कम बीस ही दे दो।

भोला ने फिर आंखें मटकाते हुए कहा, “दस की ले ली कापी किताबें, दस की दे दी फीस। सेठजी अब काहे के बीस?”

यह सुनकर सेठजी को तो चक्कर आने लगे उन्होंने फिर कहा, भोला, कम से कम मुझे ब्याज ही दे दो।”

भोला फिर मुस्कराते बोला, “दस की ले ली सब्जी सब्जी, दस की ले ली प्याज, सेठजी अब काहे का ब्याज।”

इतना सुनते ही सेठजी के पैरों तले जमीन खिसक गई। वह धड़ाम से नीचे गिर गए। भोला ने सेठ को बेईमानी का मज़ा चखा दिया था। सेठजी अपनी करनी पर पछता रहे थे।

~ चन्द्रप्रभा त्रिपाठी

Bachchon ki Kahani #5 – सोने का निवाला

राजा के पापा उसे लेकर दांतों के डॉक्टर के पास गए थे डॉक्टर ने कड़े निर्देश दिए थे कि राजा को मीठा न खाने दिया जाए। उसके बहुत से दांत खराब हो गए थे। पर राजा किसी की सुनता, तब ना! वह तो मीठे का कीड़ा था। गुड़, चीनी, मिठाई, बिस्किट कोई चीज़ उसके हाथ से नहीं बचती थी।

मां परेशान हो जाती। वह भोजन करने बैठता तो दूध रोटी मांगता। नाश्ते में जलेबी की मांग करता। टिफिन में रोज मीठा पराठा रखने की जिद करता। यही नहीं उसे जेब खर्च के लिए जो पैसा मिलते, उससे भी इमरती-जलेबी खरीद कर खाता।

मां उसे अपने साथ कहीं ले जाना पसंद न करती। वह मीठी चीजों पर बढ़-चढ़कर हाथ साफ करता। परिणाम दांतों की सड़न के रूप में निकलना था, सो निकला। अब उसके मा-पिता को बहुत चिंता होने लगी। उन्होंने बहुत समझाया पर राजा पर कोई प्रभाव नही हुआ।

राजा की मां ने अपनी ओर से सावधानी बरतनी आरंभ की। घर में मीठा बनाना बंद कर दिया। मिठाई लाना छोड़ दिया। गुड़-चीनी के डिब्बे छिपाकर रखने लगी। राजा के पापा ने उसका जेब खर्च बद कर दिया। लेकिन बजाय सुधरने के राजा और बिगड़ गया उसे चीजे मिलनी बंद हुई, तो उसने खाना-पीना छोड़ दिया। रो-रोकर सबको परेशान करता। फर्श पर गिरकर मचलने लगता। मा हार जाती। फिर पहले जैसी ही स्थिति हो गई राजा मिठाई का कीड़ा बन गया।

राजा के पापा ने एक बार उसे हॉस्टल भेजने का भी निर्णय लिया पर मां आड़े आ गई। उन्हीं दिनों राजा के पापा को कार्यालय के काम से एक महीने के लिए इंडोनेशिया जाने का अवसर आया। उन्होंने एक युक्ति सोची और राजा की मां से कहा, “अगले सप्ताह मुझे इंडोनेशिया जाना है तुम भी चलो घूम आएंगे।” राजा ने खुश होकर कहा मैं भी चलूंगा पापा।”

“तुम कैसे चल सकते हो बेटा, पन्द्रह दिन बाद तुम्हारी परीक्षा है।” पापा ने कहा।

मैं नहीं चल सकती” राजा की मा ने कहा परीक्षा के दिनों में राजा के पास किसी को तो होना ही चाहिए।”

“उसकी चिंता न करो। एक महीने मां-पिताजी फार्म से यहा आकर रहेगें।” राजा के दादा जी सेना से निवृत्त हुए थे। शहर से बाहर फार्म पर
ही मकान बनाकर रहते थे। राजा के माँ-पिताजी के जाने के बाद वह शहर आ गए।

दादीजी बीमार थी । वह अधिक समय पलंग पर लेटी रहती। दादाजी राजा का साथ देते। उसका गृहकार्य कराते। स्कूल छोड़ने जाते। उसे तैयार करते और उसके साथ खेलते।

पहले दिन दादा जी ने फ्रिज खोला तो मिठाई के डिब्बे देखकर बोले अरे? ये सब क्या कर रखा है बहू ने? ये चीजें स्वास्थ्य के लिए बहुत हानिकारक है ।

“बाई?” उन्होंने महरी बुला कर कहा “ये सब तुम ले जाओ।”

राजा की सांस ऊपर की ऊपर नीचे की नीचे रह गयी। वह चाहता था कहे कि दादाजी ये बेकार नहीं हैं, मा उसके लिए खासतौर से रख गई हैं, पर दादाजी के सामने कुछ न कह सका। शाम को दादाजी बहुत सारे फल लेकर आए। राजा से कहा, जब भूख लगे फल खाना। बच्चों को फल खाना चाहिए। दिमागी मेहनत करनी पड़ती है न। फल ताकत देते हैं। मिठाई तो पल भर का चटकारा है, उसके बाद तो हानि पहुंचती है।”

रात को जब दादा जी सोने के लिए लेट गए तो राजा दबे पांव रसोई-घर में पहुंचा। दादाजी ने खटका सुना तो शोर मचा दिया”चोर. …..चोर….चोर! ”

किराये मकान था। मकान मालिक और दो अन्य किरायेदार भी वहीं रहते थे साझा आंगन था। चार-पांच लोग पलक झपकते आंगन में एकत्र हो गए। दादाजी ने बिजली जलाई। देखा, राजा के मुंह में गुड़ भरा था और हाथ में गुड़ का बड़ा सा टुकड़ा था। वह हक्का-बक्का सबको देख रहा था।

“वाह बेटा! वाह? तुमने हमारी नाक कटवा दी। चोरी करते हुए पकड़े गए।” दादाजी ने कहा तो राजा गुड़ फेंककर रोने लगा।

दूसरे दिन दादाजी पुस्तकें पोस्टरों की सहायता से राजा को प्रतिदिन समझाना शुरू कर दिया कि मीठा खाने से क्या-क्या नुकसान होते हैं और पोषक आहार लेने से स्वास्थ्य अच्छा कैसा रहता है।

राजा के मां-पिताजी इंडोनेशिया से वापस आए, तो राजा को बिलकुल बदला हुआ पाया। न वह मीठे के लिए जिद करता था न अधिक मीठा खाता था। दादाजी से इस चमत्कार का रहस्य पूछने पर वह बोले “बच्चों के स्वास्थ्य की रक्षा की जिम्मेदारी माता- पिता पर होती है। उसके लिये उन्हें पहले से ही सावधानी बरतनी चाहिए। मैंने राजा की आवश्यकताओं पर ध्यान दिया। उस दिन चार लोगों के सामने उसे चुराकर गुड़ खाते देखा। मैंने इस पर बल दिया कि दूसरों से छिपाकर किया जाने वाला काम गलत होता है। गुड़ खाना कोई आवश्यकता तो नहीं थी जिसके लिए चोरी की जाती।”

आप सच कहते हैं पिताजी राजा ने सिर झुकाकर कहा।

“राजा को मीठे ने नहीं तुम्हारे लाड़-प्यार ने बिगाड़ा है। प्यार करना है तो एक सीमा तक करो। खिलाना है तो खिलाओ ये कहावत ठीक ही है कि खिलाओ सोने का निवाला, पर देखो शेर की आख से।”

सब हंसने लगे। राजा भी मुस्कुरा रहा था।

~ बानो सरतान

Hindi Mein Kahani #6 – जादुई फिरन

मिन्नी पढ़ने-लिखने में बहुत होशियार थी। जो बात एक बार बताई जाती उसे हमेशा के लिए याद हो जाती। लेकिन उसे कथाएं गढ़ने का बहुत शौक था। कथा बनाकर वह उस कहानी के पात्रों के साथ मौज मनाने लगती। फिर अगले दिन अपनी सहेलियों को उस घटना को बढ़ा-चढ़ाकर सुनाती। कई सहेलियां उस पर भरोसा करतीं तो कई उसकी खिल्ली उड़ाती ।

एक दिन मिन्नी ने अपनी सहेलियों को बताया कि बीती रात वह सौ मंजिला इमारत की सीढ़ियां चढ़-चढ़कर उतरती रही।

“एक – दो भी नहीं पूरी सौ मंजिल की इमारत और उसकी सीढ़ियां चढ़कर कई बार उतरी तू।” एक सहेली ने मज़ाक में कहा।

हां-हां, यकीन नहीं आता तो मेरी आंखों की तरफ देख लो। रात भर न सोने से लाल पड़ी हुई हैं। सचमुच मिन्नी की आंखें लाल थीं।

तभी दूसरी सहेली ने कहा, “मगर मिन्नी, वह इमारत है कहा? तुमने कहां देखी?”

मिन्नी जवाब देती उससे पहले ही सारी सखियां बोलीं, “सपने में सपने में। हमारी मिन्नी ऐसे सपने बहुत देखती है।”

सहेलियों की बात सुन मिन्नी वहां से भाग गई। वह रुआंसी हो आई थी। आखिर कोई उसकी बात पर यकीन क्यों नहीं करता। मिन्नी अपने घर की तरफ जा रही थी कि सामने से उसे राजू आता दिखाई दिया। राजू उस मोहल्ले का सबसे शैतान लड़का था। वह एक लम्बा सा कोट पहने था।

“राजू, यह कोट तो बहुत अच्छा है। कहा से आया?” मिन्नी ने पूछा।

“यह सीधा स्वर्ग से आया है।” राजू बोला।

“स्वर्ग से। भला कैसे? स्वर्ग जाकर तो कोई वापस नहीं आता।” मिन्नी की समझ में नहीं आया।

“अरे पागल, तो मैं कौन-सा उस ऊपर वाले स्वर्ग की बात कह रहा हूँ। मैं तो इस धरती के स्वर्ग के बारे में कह रहा हूं। धरती का स्वर्ग यानी कि कश्मीर। राजू बोला, “और इसे कोट नहीं फिरन कहते हैं।”

मिन्नी का कल्पनाशील दिमाग दौड़ने लगा – “क्या कहा राजू फिरन? अरे हां, मुझे याद आया। मेरी मम्मी के पास भी एक ऐसा फिरन था।”

अच्छा। “तुम्हें पता है वह जादुई फिरन था।” मिन्नी बोली।

“जादुई, वह कैसे?” राजू ने पूछा।

“मालूम, मेरी मां सर्दी में उसे खूब पहनती थीं फिर जब गर्मियां आती तो वह धोकर उसे ट्रंक में नहीं रखती थीं”

“तो फिर?” राजू बोला।

वह उसे दोनों तरफ से बांधकर उसमें गेहूं भरकर रख देती थी। गेहूं उसमें काफी सुरक्षित रहते थे एक बार क्या हुआ कि मां को याद ही नहीं रहा। सर्दी के दिनों में मां ने वैसे ही बिना धोए फिरन को पहन लिया। उसकी बाजुओं में कुछ गेहूं के दाने अटके पड़े थे शरीर की गरमी पाकर वे उग आए। मां जब घर से बाहर निकली तो उनकी बाजुओं पर गेहूं के पौधे लहलहा रहे थे। उन पर बालियां लटकी हुई थीं।”

राजू की आंखें आश्चर्य से खुली रही गई, “फिर क्या हुआ?”

“मेरी मां को लोगों ने बताया तो वह जल्दी से घर वापस आ गई। घर आकर उन्होंने गेहूं की बालियां तोड़नी चालू की वह बालियां तोड़ती कि बालियां फिर उग आतीं। अब घर में जिधर देखो उधर गेहूं की बालियां ही बालियां दिखाई देतीं। जो सुनता तो आश्चर्य करता।”

मिन्नी रुकी तो राजू बोला, “मगर यह किस्सा तो मेरे माता-पिता को भी मालूम होगा। उन्होंने तो कभी नहीं सुनाया।”

“हो सकता है भूल गए हों । मिन्नी ने अपनी बड़ी-बड़ी आंखें मटकाते हुए कहा।

“तो अब वह फिर कहाँ है? राजू ने पूछा।

अरे, मत पूछो। उसका भी बड़ा मजेदार किस्सा है। मां के फिरन की बात पूरे शहर में मशहूर हो गई थी कि एक दिन कुछ लोग घर पर आ गए। वे समाज सेवा करने वाले थे। उन्होंने बताया कि एक जगह अकाल पड़ा हुआ है। वहां गेहूं की जरूरत थी। सरकार के भंडार में गेहूं खत्म हो चुका था। उन्होंने मेरी मां से प्रार्थना की कि यदि वह फिरन उन्हें दे दें तो बहुत लोगों की मदद हो सकती है। मां ठहरी दयालु उन्होंने फौरन वह फिरन उतारकर दे दिया।

अब तक मिन्नी का घर आ चुका था। राजू को उसकी मां दिखीं तो राजू बोला, “आंटी, काश मैं भी जादुई फिरन को देख पाता!”

“जादुई फिरन कौन-सा भला?” मां ने पूछा। “वही न आटी जिसमें गेहूं उगते थे और आपने उसे अकाल पीड़ितों को दे दिया था। राजू ने कहा।

जरूर यह ऊटपटांग कहानी तुझे मिन्नी ने सुनाई होगी। आ गया न तू भी उसकी बातों में।” कहती हुई मिन्नी की मां अंदर चली गई। राजू ने मुड़कर देखा, मिन्नी भी वहां से नौ-दो ग्यारह हो चुकी थी।

~ क्षमा शर्मा

Hindi Kahani #7 – मेवे की खीर

एक था बच्चा। नाम था उसका मोनू। छोटा-सा, प्यारा-प्यारा, लेकिन बड़ा खिलाड़ी। पढ़ने-लिखने में उसका मन ही नहीं लगता। मां रोज़ प्यार से समझाती, “बेटा, पढ़ोगे-लिखोगे नहीं तो बड़े अफसर कैसे बनोगे? तुम्हें चाट-पकौड़ी का ठेला लगाना पड़ेगा।” मोनू हंसकर मां के गले में अपनी बाहें डाल देता। कहता, “ऐसा नहीं होगा, मां तुम देखना, मैं खूब पढूंगा। पढ़-लिखकर पापा से भी बड़ा अफसर बनूंगा।”

“सिर्फ सोचने से अफसर नहीं बनते हैं बेटा। उसके लिए बहुत मेहनत करनी पड़ती है।” मां प्यार से समझाती। लेकिन मोनू महाशय मां की बातों पर ध्यान न देते जब जी चाहा, गेंद उठाई और खेलने निकल पड़े। जब मन किया, पतंग-चरखी उठाई और छत पर चढ़ गये। जब इच्छा हुई, जेब में मूंगफली भरी और पार्क में झूला झूलने चल दिये।

माँ टोकती रह जाती, “बेटा, सुनो तो सही, तुमने पढ़ाई का जो टाइम टेबिल बनाया था, उसका क्या हुआ?”

“आज क्रिकेट का मैच है माँ। मैं अपनी टीम का फास्ट बॉलर हूं। मैदान में नहीं पहुंचूंगा तो लड़के नाराज होंगे। टाइम टेबिल के अनुसार पढ़ाई कल से करुंगा।” मोनू जी बड़े मजे से मां को पट्टी पढ़ा देते।

मां झुंझलाती रह जाती, “यह लड़का है या मुसीबत । मेरी तो कभी सुनता ही नहीं है। आज आने दो इसके पापा को, शिकायत करूंगी।”

पर शिकायत की नौबत भी कहां आ पाती? दिन भर के थके-मांद पापा रात को जब घर लौटते. मोनू बिस्तर पर सोया मिलता। पापा जब सुबह सोकर उठते, मोनू स्कूल जा चुका होता। बचता एक इतवार का दिन। उस रोज पापा के इतने मिलने-जुलने याले आते कि डांट वाली बात मां भूल ही जाती। बस, मोनू बाबू की चांदी हो जाती। दिन इसी तरह निकलते गये।

शुरू जुलाई में मोनू ने लाल-पीली स्याही से पढ़ाई का जो टाइम टेबिल बनाया था, वह मेज पर पड़ा-पड़ा धूल से गंदा हो गया। खिलाड़ी मोनू न अपने मन से कभी पढ़ने बैठता, न मां के टोकने का कभी उस पर कोई असर होता। माँ परेशान समझ नहीं पाती कि क्या करे?

और ऐसे ही छमाही इम्तहान नजदीक आ गये। लेकिन मोनू का खिलाड़ी न कम न हुआ। रोज़ की तरह उस शाम भी जब वह घर से निकलने लगा, मां ने आवाज दी, बेटे, जरा सुनो।

“जी मां।” उछलता-कूदता मोनू ठहर गया।

“आज शनिवार है न”

“जी हाँ।

“टाइम टेबिल के हिसाब से आज तुम्हें कौन-सा विषय पढ़ना है?”

पढ़ाई की चर्चा मोनू को बहुत बुरी लगी। मुंह बनाते हुए बोला. आज हमारा दूसरे मुहल्ले के लड़कों के साथ क्रिकेट का मैच है। टाइम टेबल को कल से…।”

“हाँ-हाँ, ठीक है।” मां ने तुरन्त बात खत्म कर दी. “तुम जाओ, दोस्त इंतजार कर रहे होंगे लेकिन लौटने में ज्यादा देर मत लगाना। आज तुम्हारी मन पसन्द मेवे की खीर बना रही हूँ।” मां मुस्कराई तो सोने की बांहें खिल गई।

“वाह खीर” कहते हुए उसके मुंह में पानी भर आया। मां से “टा-टा” करके वह खेलने निकल गया।

फिर उस दिन ऐसा हुआ कि खिलाड़ी मोनू का मन खेल में कम, खीर में ज्यादा लगा रहा। थोड़ी-थोड़ी देर बाद वह चटखारे भरकर सोचता- “अहा जी! आज तो खाने में मजा आ जायेगा। मेवे की खीर मिलेगी। खूर गाढ़ा दूध, ढेर सारे मेवे और चीनी की मिठास। भीमा हलवाई की रसमलाई को पछाड़ देने वाली माँ की स्वादिष्ट खीर कोई कुछ भी कहे, वह तो उंगलियां चाट-चाट कर खाना खाने-पीने के मामले में भला शर्म कैसी?”

और खेल खत्म होते ही लंबे-लंबे डग भरता हुआ वह घर पहुंचा। रसोई के दरवाजे पर खड़ा होकर बोला, “खीर पकने में कितनी देर है, माँ? मुझे भूख लगी है।

“बस, दो मिनट!” मा मुस्कराई, “अभी खाना तैयार हुआ जाता है।”

मोनू कमरे में आकर टेलीविजन देखने बैठ गया, लेकिन उसकी आंखों के सामने मेवे की खीर घूमती रही। टेलीविजन देखने में उसका मन न लगा।

जैसे ही रसोई से मां की आवाज़ सुनाई दी, “मोनू, खाना खाने आओ।” झटपट हाथ धोकर वह खाना खाने पहुंच गया।

पर यह क्या? यहां तो थाली में लौकी की सब्जी और रोटियां रखी हुई थीं। थाली देखते ही मोनू के मुंह का स्वाद बिगड़ गया। इस लौकी के नाम से ही वह चिढ़ता है, फिर भी पता नहीं क्यों मां इसे पकाकर रख देती हैं।

सोचो जरा, खीर के साथ अगर आलू के पराठे या सूखे आलू और पूरियां होती तो कितना मजा आता! खैर, एक आध रोटी इस सड़ियल सब्जी से ही खा लेगा। यह उसके बाद मजेदार खीर मुंह का स्वाद बदल देगी। मां की तो खाने का मज़ा किरकिरा करने की आदत है। अपना मूड क्यों बिगाड़े वह?

खुद को समझा-बुझा कर उसी बेस्वाद लौकी के साथ मोनू ने दो रोटियां खत्म की। फिर इधर-उधर देखते हुए बोला, “अब खीर दो माँ।”

“ऐं, खीर? खीर तो नहीं है बेटा।” मां ने जैसे डरते-डरते कहा।

मोनू को मां की इस बात पर भरोसा नहीं हुआ। उसे लगा, मा हंसी कर रही है। मचलकर बोला, “तंग नहीं करो माँ, जल्दी खीर परसो। वरना मैं सारी बटलोई चट कर जाऊँगा। तुम्हारे और पापा के लिए एक चम्मच खीर भी नहीं छोडूंगा।”

“खीर सचमुच नहीं है बेटे।” मां ने सिर झुकाये हुए कहा।

“तुमने खीर नहीं पकाई?” मोनू झुंझला गया।

मां एक मिनट चुप रही। फिर धीमी आवाज़ में बोली, “आज एक जरूरी काम से पड़ोस में जाना पड़ गया खीर पकाने का वक्त ही नहीं रहा। कल जरूर बना दूंगी।”

“भाड़ में गया तुम्हारा कल!” मोनू का गुस्सा भड़क उठा, “क्यों झूठे बहाने बनाती हो मां साफ कहो, आलस में पड़कर तुमने लौकी-रोटी बना ली। खीर पकाने में झंझट जो होता है।”

“इतनी नाराजी।” मां मुस्कराई, “छोड़ो, बात खत्म करो बेटे, कल जरूर खीर पका दूंगी।”

“कैसा कल? किसका कल?” मोनू जी ऐंठे, “कल भी इसी तरह टाल जाना। एक और कल के लिए कह देना। हो जायेगी खीर की छुट्टी।”

“तुम्हें तो कम से कम यह शिकायत नहीं करनी चाहिए बेटे । तुम भी तो रोज यहीं किया करते हो। मां ने एकदम शांत आवाज में कहा।

“मैं?” मोनू चौका।

“और क्या रोज़ टाइम टेबिल के हिसाब से पढ़ाई शुरू करने की बात। रोज एक-न-एक बहाना बनाकर उसे टाल जाने की आदत। यही काम एक दिन मां ने कर दिया तो इतना गुस्सा। मां की आंखें भर आई।

मोनू का सिर शर्म से झुक गया। वह समझ गया कि मां ने उसे सीख देने के लिए ही खीर वाली बात कही थी। सचमुच खीर बनाने का आज उनका इरादा था ही नहीं।

उसके मुंह से आगे एक शब्द भी नहीं निकला। चुपचाप सिर सुखाये हुए उठा और कुल्ला करके अपने पढ़ाई के कमरे में जा पहुँचा । महीनों पहले बनाये टाइम टेबिल की धूल झाड़ते हुए मोनू ने सोचा, “आज नहीं अभी, इसी पल उसे अपनी पढ़ाई शुरू कर देनी है। मेवे की खीर नहीं, सिर्फ अपना संकल्प अब उसके सामने था।

~ उषा यादव

Hindi Kahaniya #8 – सुनहरी तितली

चीनू की मां बचपन में ही गुजर गई थी। अब वह बर्फीली पहाड़ियों के निचले हिस्से में एक घर में अपने पिता के साथ रहती थी।

चीनू बहुत ही सीधी और सरल स्वभाव की लड़की थी। बस अपने काम से काम रखती। उसका पिता तेज स्वभाव का था। मां के मर जाने पर चीनू अपने को बहुत अकेला सा महसूस करने लगी थी। उसका पिता बात-बात पर उसे झिड़क देता चीनू घंटों रोया करती।

चीन के घर के सामने एक सुंदर सा फूलों का उद्यान था। उसमें तरह-तरह के रंगीन फूल खिला करते थे। चीनू फूलों को तोड़कर बेचती थी।

यह सुदर सा उद्यान चीनू का ही था। फूलों के पौधे लगाकर इसे उसने ही सुंदर रूप दिया था। चीनू का लगभग सारा समय इसी उद्यान में बीतता था। उसे जब भी मा की याद आती वह रो पड़ती। उसे रोता देख उद्यान के सारे खिले फूलों के चेहरे ऐसे मुझ जाते मानो उन्हें भी चीनू के दुःखी होने का दुःख है।

उसका पिता जब भी उसे रोता देखता, तो गरज उठता। इससे नन्हीं चीनू और भी ज्यादा दुःखी हो जाती। फिर फूलों के बीच जाकर बैठने से उसका सारा दुःख दूर सा हो जाता और वह खुश होकर फूलो से खेलने लगती। आज काफी बर्फ गिर रही थी और सर्दी तेज पड़ रही थी। चीनू लिहाफ में दुबकी सुबक रही थी आज उसे अपनी मां की बहुत याद सता रही थी। प्रतिदिन की भांति उसने मुंह-हाथ धोया और टोकरी लेकर उधान तक जा पहुंची। फिर जूही और वेला की लताओं के नीचे उदास होकर बैठ गई।

चीनू को रोता देख जूही और बेला की लताएं उसके कंधों पर झुक गई। मानो कह रही हो – “चीनू! मत रोओ।”

पर अब भी चीनू की आंखों में आंसू थे। उसी समय उसके पिताजी आ गए। उन्होंने गुस्से में कहा तुम फिर रोने बैठ गई। चीनू ने भीगी पलकों से एक बार अपने पिता को देखा। चीनू का हृदय बहुत टूट चुका था। जब पिताजी दूसरे काम में लग गए तो चीनू अपने घर से बाहर निकल पड़ी।

जाते-जाते उसने अपने प्यारे-प्यारे फूलों से कहा ‘मेरे प्यारे दोस्तो! मैं जा रही हूं। कहीं दूर…। मेरे लिए दुआ करना। शायद कभी हम मिल पाएं।”

थककर जरा देर के लिए वह एक हरसिंगार के पेड़ के नीचे बैठ गई। तभी एक सुंदर और चमकीली सी, काले और सफेद पंखों वाली, सुनहरी तितली उसके पास चक्कर काटने लगी। चीनू उसे देखने लगी। तभी वह तितली बोली “क्यों रो रही हो बहना?”

चीनू एकदम आश्चर्य में आ गई। फिर बोली तुम कौन हो? “मैं इसी हरसिंगार के पेड़ पर रहती हूं। मेरा नाम लिली है। मैं हर साल परियों के देश से यहां आती हूं। किसी की भी सहायता करने पर सबसे पहले शायद मुझे तुम ही रोती दिखी हो। तुम्हारा नाम क्या है बहना?” उस तितली ने चीनू से पूछा।

चीनू ने आँसू पोछ लिए फिर बोली “मेरा नाम चीनू है। फिर उसने सारी कहानी उसे कह सुनाई।

“ओह! यह तो बहुत बुरा हुआ, पर कोई बात नहीं। तुम कुछ दिन यहीं रहो। मैं तुम्हारे साथ रहूंगी। तुम्हारा मन बहल जाएगा।” तितली रानी ने राय दी।

चीनू वहीं रहने लगी। तितली रानी फूलों का मधु पीती और चीनू फलों को खाती। दोनों सुखी थीं। दिन निकलते गए। सर्दी के दिन जाते रहे। बसंत आ गया। पेड़ों ने कपड़े बदले। फूलों में मधु और खुशबू बढ़ी। सारी धरती हरियाली से ढ़क गई। एक दिन तितली रानी ने चीनू से कहा, “देखो चीनू बहना! मुझे इस धरती पर रहते काफी दिन गुजर गए हैं अब मेरे वापस परीलोक में जाने का समय आ गया है। सोचती हूं अब तुम अपने घर वापस चली
जाओ।”

“पर मैं घर जा भी तो नहीं सकती। राह भूल चुकी हूं।” चीनू ने दुःखी होकर कहा।

“कोई बात नहीं। मैं तुम्हें घर छोड़ने चलूंगी।” सुबह ही दोनों घर से निकल पड़ी। तितली रानी के पास शक्ति थी। उसे चीनू के घर का रास्ता माल होता जा रहा था। वह आगे-आगे थी और चीनू उसके पीछे-पीछे। काफी रास्ता तय कर लेने के बाद उन्हें दूर किसी के चीखने की आवाज सुनाई दी। एक आदमी तेजी से भाग रहा था और दो आदमी उसका पीछा कर रहे थे।

“लगता है कोई परेशानी में है।” तितली रानी बोली।

“हां, ऐसा ही लगता है।” चीनू ने कहा।

“तुम यहीं बैठो, मैं अभी आई।” कहकर तितली रानी उड़ चली। तितली रानी ने देखा कि दो लुटेरे एक आदमी से धन छीनने की कोशिश में हैं। उसने फौरन एक घनी झाड़ी बना दी। आदमी उसमें छिप गया। लुटेरे उसे न पाकर वापस हो लिए उस आदमी ने तितली रानी को ढेरों धन्यवाद दिया, आभार माना और अपनी राह ली।

जब तितली रानी चीनू के पास पहुंची तो उसने पूछा “कौन था?” तब तितली रानी ने उसे सारी घटना और उस आदमी का हुलिया बताया।

“अच्छा! वह ऐसा था। तो जरूर यह मेरे पिताजी होंगे चलो देखते हैं।” चीनू ने कहा। दोनों उन्हें ढूंढ़ने लगे ।

“वह रहे। वह मेरे पिताजी ही हैं ” चीनू खुशी से बोली। दोनों पास पहुंची। चीनू पिता से लिपट गई फिर उसने तितली रानी के बारे में उन्हें सब कुछ बता दिया।

“मेरी प्यारी बेटी। मैंने तुझे कहां-कहां न ढूंढा। मैंने तुम्हें बहुत कष्ट दिया है। अब मैं तुम्हें कभी कष्ट न पहुंच जाऊंगा । मैं सदा तुम्हें प्यार दूंगा।” चीनू के पिता ने कहा। उन्होंने चीनू को हृदय से लगा लिया। तितली रानी भी पिता-पुत्री का प्रेम देखकर खुश हो उठी।

तितली रानी एक बार मुस्कुराई और फिर बोली “अब मेरा परीलोक जाने का समय हो आया है चीनू। अब मैं जा रही हूं।” कहकर तितली रानी दूर गगन में उड़ गई।

“फिर आना।” – चीनू ने कहा। वह अब भी तितली रानी को देखे जा रही थी। उसकी आंखों में हर्ष के आंसू थे तितली रानी गगन में गुम हो गई थी।

चीनू और उसके पिता वापस घर की ओर चल दिए। चीनू एक बार फिर अपने प्यारे फूलों से जा मिली थी।

~ मोहम्मद साजिद खान


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