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    Home - Quotes - Chanakya Quotes in Hindi | मास्टरमाइंड चाणक्य के सुविचार

    Chanakya Quotes in Hindi | मास्टरमाइंड चाणक्य के सुविचार

    Editorial TeamEditorial TeamMay 14, 2020
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    chanakya thoughts in hindi
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    चाणक्य एक भारतीय राजनेता और दार्शनिक, मुख्य सलाहकार और भारतीय सम्राट चंद्रगुप्त के प्रधान मंत्री थे, जो मौर्य साम्राज्य के पहले शासक थे। यहाँ पर उनके कुछ सुविचार (Chanakya Quotes in Hindi) प्रस्तुत किये गये हैं जो कि एक बेहतर जीवन के लिए किसी मंत्र से कम नहीं हैं. उनके कुछ विचार विवादस्पद भी रहे हैं.

    चाणक्य ब्राह्मण जाति (पुरोहित वर्ग) के थे, वे मूल रूप से उत्तरी भारत के थे और तक्षशिला विश्वविद्यालय में राजनीतिक विज्ञान और अर्थशास्त्र के प्रोफेसर थे। वेदों के साहित्य के विषय में वे पूरी तरह से ज्ञानी थे और यह भी माना जाता है कि उन्हें जरथुस्त्रवाद का कुछ ज्ञान था।

    चाणक्य नीति से लिए गये कुछ अनमोल सबक यहाँ पढ़ें >> चाणक्य नीति संग्रह

    Chanakya Quotes in Hindi Images (1-10)

    Chanakya Quotes in Hindi Images
    Thoughts by Chanakya in Hindi

    आपत्ति दूर करने के लिए धन को बचाना चाहिए; धन से स्त्री की रक्षा करनी चाहिए; सब काल में स्त्री और धन से भी अपनी रक्षा करना उचित है।

    दुलार करने से बहुत दोष होते हैं और दण्ड देने से बहुत गुण। इसलिए पुत्र और शिष्य को दण्ड देना ही उचित है।

    जिस देश में न आदर है, न जीविका, न बन्धु और न विद्या का लाभ, वहाँ वास नहीं करना चाहिए।

    कुमित्र पर विश्वास तो किसी प्रकार से नहीं करना चाहिए और सुमित्र पर भी विश्वास न रक्खे, क्योंकि यदि कदाचित् मित्र रुष्ट हो जायगा, तो सब गुप्त बातों प्रकट कर देगा।

    धनिक, वेद का ज्ञाता, राजा, नदी और वैद्य, ये पांच जहाँ विद्यमान न हों, वहां एक दिन भी वास न करना चाहिए।

    जीविका, भय, लज्जा, अनुकूलता और देने की प्रकृति, ये पाँच बातें जहाँ न हों, वहाँ न रहना चाहिए।

    बीमार होने पर, कष्ट पड़ने पर, अकाल पड़ने पर, वैरियों से संकट आने पर, राजा के समीप और श्मशान में जो साथ देता है वही बन्धु है।

    आँख के ओट होने पर काम बिगाड़े, सम्मुख होने पर मीठी-मीठी बातें बनाकर कहे, ऐसे मित्र को ऊपर दूध से और भीतर विष से भरे हुए घड़े के समान छोड़ देना चाहिए।

    मूर्खता दुःख देती है और युवावस्था भी कष्ट में फंसा देती है; परन्तु दूसरे के गृह का वास तो बहुत ही दुःख दायक होता है

    मन से सोचे हुए काम को वचन से प्रकट न करे; किन्तु मंत्रणा से उसकी रक्षा करे और गुप्त ही उस कार्य को काम में भी लावे।

    Chanakya Quotes about Ladies in Hindi (11-20)

    Chanakya Quotes on Stree
    Chanakya Quotes on Stree

    पुरुष से स्त्रियों का आहार दूना, लज्जा चौगुनी, साहस छगुना और काम अठगुना होता है।

    असत्य बोलना, विना विचारे किसी काम में झटपट लग जाना या साहस, छल, मूर्खता, लोभ, अपवित्रता और निर्दयता, ये स्त्रियों के स्वाभाविक दोष है।

    भोजन के पदार्थ और भोजन की शक्ति, सुन्दर स्त्री और रति की शक्ति, ऐश्वर्य और दान शक्ति, इनका होना थोड़े तप का फल नहीं है।

    नदियों का, शस्त्रधारियों का, नखवाले और सींगवाले पशुओं का, स्त्रियों का और राजकुल का विश्वास न करना चाहिए।

    बुद्धिमान् को चाहिए कि उत्तम कुल की कुरूपा कन्या के साथ विवाह कर ले; नीच कुल की कन्या यदि सुन्दरी हो, तो भी उसके साथ विवाह न करे; क्योंकि विवाह तुल्य कुल में ही विहित है।

    जिसका पुत्र वश में रहता है, स्त्री इच्छा के अनुसार चलती है, जो अल्प विभव में संतुष्ट रहता है, उसके लिए स्वर्ग यहीं है।

    वही पुत्र है जो पिता का भक्त है, वही पिता है जो पालन करता है, वही मित्र है जिस पर विश्वास है, वही स्त्री है जिससे सुख प्राप्त हो।

    काम में लगाने पर सेवकों की, दुख आने पर बान्धवों की, विपत्ति काल में मित्र की और विभव का नाश होने पर स्त्री की परीक्षा होती है।

    दुष्ट स्त्री, शठमित्र, उत्तर देनेवाला दास और सांप वाले घर में वास, ये मृत्युस्वरूप ही हैं, इसमें कुछ भी संशय नहीं

    बुद्धिमान् लोग लड़कों को नाना भांति की सुशीलता में लगावें; क्योंकि नीति जाननेवाले यदि शीलवान् हों, तो कुल में पूजित होते हैं।

    चाणक्य के सुविचार | Thoughts by Chanakya in Hindi (21-30)

    Chanakya Quotes in Hindi
    Chanakya Quotes in Hindi Images

    वह माता शत्रु और पिता वैरी है, जिसने अपने बालकों को नहीं पढ़ाया; क्योंकि सभा में वे पुत्र वैसे ही नहीं सोहते, जैसे हंसों के बीच बगुला।

    विपत्ति निवारण करने के लिए धन की रक्षा करना उचित है। क्या श्रीमानों को भी कभी आपत्ति आती है? हाँ, कदाचित् दैवयोग से लक्ष्मी चली जाती है तो उस समय संचित भी नष्ट हो जाता है।

    एक श्लोक, आधा श्लोक अथवा चौथाई श्लोक प्रतिदिन पढ़ना उचित है; क्योंकि दान, अध्ययन आदि कर्मों से दिन सार्थक करना चाहिए, व्यर्थ न जाने देना चाहिए।

    स्त्री का विरह, अपने जनों से अनादर, युद्ध करके बचा हुआ शत्रु, कुत्सित राजा की सेवा, दरिद्रता और अविवेकियों की सभा, ये बिना आग ही शरीर को जलाते हैं।

    नदी-तट के वृक्ष, दूसरे के घर में जाने या रहनेवाली स्त्री और मन्त्री से रहित राजा, निश्चय ही ये शीघ्र नष्ट हो जाते हैं।

    वेश्या निर्धन पुरुष को, प्रजा शक्तिहीन राजा को, पक्षी फलरहित वृक्ष को और अभ्यागत भोजन करके घर को छोड़ देते हैं।

    ब्राह्मण दक्षिणा लेकर यजमान को त्याग देते हैं, शिष्य विद्या प्राप्त हो जाने पर गुरु को और जले हुए वन को मृग छोड़ देते हैं।

    दुराचारी, कुदृष्टि रखनेवाला और बुरे स्थान में बसने वाला, ऐसे दुर्जन पुरुष की मैत्री जिसके साथ होती है, वह नर शीघ्र ही नष्ट हो जाता है।

    समान जन में प्रीति सोहती है, सेवा राजा की सोहती है, व्यवहारों में बनियई और घर में दिव्य स्त्री सोहती है।

    किसके कुल में दोष नहीं है ? व्याधि ने किसे पीड़ित नहीं किया ? किसको कष्ट नहीं मिला ? किसको सदा सुख ही रखा है ?

    Chanakya Quotes in Hindi Images (31-40)

    Quotes by Chanakya in Hindi
    Quotes by Chanakya in Hindi

    आचार कुल को बताता है, बोली देश को बतलाती है, आदर स्नेह प्रीति को प्रकट करता और शरीर भोजन को बताता है।

    कन्या श्रेष्ठ कुल वाले को देनी चाहिए, पुत्र को विद्या में लगाना चाहिए, शत्रु को दुःख पहुंचाना चाहिए और मित्र को धर्म का उपदेश करना चाहिए।

    दुर्जन और साँप में साँप अच्छा है, दुर्जन नहीं। कारण, साँप काल आने पर काटता है, पर खल तो पद-पद पर दुःखदाई होते हैं।

    राजा लोग कुलीनों का संग्रह इसलिए करते हैं, अर्थात् उन्हें इसलिए अपने पास रखते हैं कि वे आदि अर्थात् उन्नति, मध्य और अन्त अर्थात् विपत्ति में राजा को नहीं छोड़ते।

    समुद्र प्रलय के समय में अपनी मर्यादा को छोड़ देता है, और सागर भेद की इच्छा भी रखते हैं, अर्थात् किनारों को छोड़ देते हैं; परन्तु साधु लोग प्रलय होने पर भी अपनी मर्यादा नहीं छोड़ते।

    मूर्ख से दूर रहना उचित है। कारण, देखने में वह मनुष्य है, परन्तु यथार्थ में दो पैरों का पशु है और वाक्यरूप काँटे से वैसे ही बेधता है जैसे अन्धे को काँटा।

    रूप, जवानी और बड़े कुल में जन्म, इनके रहते भी विद्याहीन पुरुष बिना गंध वाले टेसू के फूल के समान नहीं सोहते।

    कोयलों की शोभा स्वर है, स्त्रियों की शोभा पतिव्रत है, कुरूपों की शोभा विद्या है, तपस्वियों की शोभा क्षमा है।

    कुल के भले के लिए एक को छोड़ देना चाहिए, ग्राम के लिए कुल का त्याग करना उचित है। देश के लिए ग्राम का और अपने लिए समस्त पृथ्वी का त्याग उचित है।

    उद्योग करने पर दरिद्रता नहीं रहती, जपनेवाले का पाप नहीं रहता, मौन होने से कलह नहीं होता और जागनेवाले के निकट भय नहीं आता।

    Precious Words by Chanakya in Hindi (41-50)

    अति सुन्दरता के कारण सीता हरी गई, अति गर्व से रावण मारा गया, अति दान देने से बलि को बँधना पडा। इसलिए अति सब जगह छोड़ देनी चाहिए।

    समर्थ को कौन काम कठिन है ? रोजगारी के लिए कौन जगह दूर है ? सुन्दर विद्यावालों को कौन विदेश है ? प्रियवादियों के लिए कौन पराया है ?

    एक भी अच्छे वृक्ष से, जिसमें सुन्दर फूल और सुगंध है, सब वन सुवासित हो जाता है, जैसे सुपुत्र से कुल।

    विद्यायुक्त एक भले पुत्र से सब कुछ ऐसा उज्जवल हो जाता है, जैसे चन्द्रमा से रात्रि।

    शोक-सन्ताप उत्पन्न करनेवाले बहुत पुत्रों से क्या लाभ? कुल को सहारा देने वाला एक ही पुत्र श्रेष्ठ है, जो कुल का कुल आधार होता है।

    पुत्र का पांच वर्ष तक दुलार, और फिर दस वर्ष तक ताड़न करे । सोलहवें वर्ष के लगते ही पुत्र के साथ मित्र का सा व्यवहार करे।

    उपद्रव उठने पर, शत्रु के आक्रमण करने पर, भयानक अकाल पड़ने पर और खल जनों का संग होने पर जो भागता है, वही जीता है ।।

    धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, इनमें से जिसने कोई न प्राप्त किया, उसको मृत्युलोक में वारंवार जन्म लेकर केवल मरण ही लाभ होता है।

    जहाँ मूर्ख नहीं पूजे जाते, जहाँ अन्न संचित रहता है और जहाँ पति-पत्नी में लड़ाई नहीं होती, वहाँ लक्ष्मी आप ही आकर रहती है।

    यह निश्चय है कि आयु, कर्म, धन, विद्या और मरण, ये पांच बातें, जब जीव गर्भ में रहता है, तभी लिख दी जाती हैं।

    चाणक्य के अनमोल विचार (51-60)

    पुत्र, मित्र और बन्धु ये साधुजनों से निवृत्त हो जाते हैं अर्थात् इनकी ममता छूट जाती है और जो उन साधुओं का अनुसरण करते हैं, उनके पुण्य से संपूर्ण कुल कृतकृत्य हो जाता है

    मछली, कछुआ और चिड़िया, के जैसे दर्शन, ध्यान और स्पर्श से बच्चों को सर्वदा पालती हैं, वैसे ही सज्जनों की संगति भी सत्संग करनेवालों को पालती अर्थात् उनका भला करती है।

    जब तक देह नीरोग है और मृत्यु दूर है, तब तक अपना हित और पुण्य आदि करना उचित है। प्राणान्त हो जाने पर फिर कोई क्या करेगा?

    विद्या में कामधेनु के समान गुण है; क्योंकि वह असमय में भी फल देती है। वह विदेश में माता के समान रक्षा करती है, इसलिए विद्या को गुप्त धन समझना चाहिए।

    सैकड़ों गुणहीन पुत्रों से एक भी गुणी पुत्र श्रेष्ठ है। एक ही चन्द्र अंधकार का नाश करता है, सहस्रों तारे नहीं।

    मूर्ख पुत्र दीर्घजीवी भी हो, तो उससे उत्पन्न होते ही मर जानेवाला श्रेष्ठ है; क्योंकि मरा हुआ थोड़े ही दुख का कारण होता है; पर मूर्ख जब तक जीता है, तब तक जलाता है।

    कुग्राम में वास, नीच कुल की सेवा, कु्रजन, कलह- कारिणी स्त्री, मूर्ख पुत्र, विधवा कन्या, ये छः बिना आग के ही शरीर को जलाते हैं।

    उस गाय से क्या लाभ, जो न दूध दे, न गाभिन हो ? ऐसे ही उस पुत्र से क्या लाभ, जो न विद्वान् हो, न माता पिता का भक्त ?

    राजा लोग एक ही वार आज्ञा देते हैं, पंडित लोग एक ही वार बोलते हैं, कन्या एक ही बार दी जाती है। ये तीनों बात एक ही बार होती हैं ।।

    अकेले तप, दो से पढ़ना, तीन से गाना, चार से राह चलना, पाँच से खेती और बहुतों से युद्ध भली भांति बनता है।

    Chanakya Thoughts | Chanakya Status (61-70)

    वही भार्या है जो पवित्र और चतुर है, वही भार्या है जो पतिव्रता है, वही भार्या है जिस पर पति की प्रीति है, वही भार्या है जो सत्य बोलती है । अर्थात् वही दान, मान, पोषण और पालन के योग्य है।

    निपूते का घर सूना है, जहाँ बन्धु-बान्धव न हों वे दिशाएँ शून्य हैं, मूर्ख का हृदय शून्य है और दरिद्र को सभी सूना है।

    बिना अभ्यास के शास्त्र विषय है, बिना पचे भोजन विष है, दरिद्रों के लिए बैठक और युद्ध के लिए युवती स्त्री विष है।

    दया-रहित धर्म को छोड़ देना चाहिए। विद्याहीन गुरु को त्यागना उचित है। सदा कुपित रहनेवाली भार्या को अलग कर देना चाहिए और विना प्रकृति के बान्धवों को त्याग देना उचित है।

    मनुष्यों के लिए राह चलना बुढ़ापा है, घोड़े के लिए बाँध रखना बुढ़ापा है, स्त्रियों के लिए रति का न करना बुढ़ापा है तथा वस्त्रों के लिए घाम बुढ़ापा है अर्थात् उन्हें जीर्ण करने वाला है।

    कैसा ये कौन काल है, मेरे मित्र कौन हैं, कौन या कैसा देश है, मेरी आमदनी और खर्च क्या है, मैं कौन हूँ और मेरी शक्ति कितनी है, यह मनुष्य को बार-बार अर्थात् सदा विचारना चाहिए।

    ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य इनका देवता अग्नि है। मुनियों के हृदय में देवता रहते हैं । अल्पबुद्धियों के लिए मूर्ति में और समदशियों के लिए सब स्थानों में देवता रहते हैं।

    ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य का गुरु अग्नि है। चारों वर्णों का गुरु ब्राह्मण है। स्त्रियों का गुरु पति है; और सबका गुरु अभ्यागत है।

    घिसकर, काटकर, तपाकर और पीटकर, इन चार प्रकारों से जैसे सोने की परीक्षा की जाती है, वैसे ही दान, शील, गुण और आचार, इन चारों प्रकारों से पुरुष की परीक्षा होती है।

    तब तक भय से डरना चाहिए, जब तक भय न आया हो । जब भय को आया हुआ देख ले, तब उस पर प्रहार करना उचित है।

    चाणक्य के उद्धरण | Golden Quotes by Chanakya (71-80)

    एक ही गर्भ से एवं एक ही नक्षत्र में उत्पन्न नर शील में समान नहीं होते, जैसे बेर के फल और उसके काँटे सब बराबर नहीं होते।

    अधिकारी निःस्पृह नहीं होते, अर्थात् अधिकार पाकर निस्पृह होना कठिन है । श्रृंगार का प्रेमी कभी अकाम नहीं होता, अर्थात् वह अवश्य कामुक होता है । जो चतुर नहीं है, वह प्रियवादी नहीं हो सकता और स्पष्ट कहने वाला कभी धोखेबाज नहीं होता।

    मूर्ख पंडितों से, दरिद्री धनियों से, व्यभिचारिणी कुलीन स्त्रियों से और विधवा सुहागवाली स्त्रियों से द्वेष रखती हैं।

    आलस्य से विद्या नष्ट हो जाती है, दूसरे के हाथ में जाने से धन निरर्थक हो जाता है, बीज की कमी से खेत नष्ट हो जाता है, और सेनापति के विना सेना मारी जाती है।

    अभ्यास से विद्या, सुशीलता से कुल, गुण से सज्जन व्यक्ति और नेत्र से कोप ज्ञात होता है।

    धन से धर्म की रक्षा होती है। यम, नियम आदि योग से ज्ञान रक्षित होता है । मृदुता से राजा की रक्षा होती है, और भली स्त्री से घर की रक्षा होती है।

    वेद के पाण्डित्य को अन्यथा कहनेवाला, शास्त्र और उसके आचार के विषय में व्यर्थ विवाद करनेवाला और शांत(साधु) पुरुष को अन्यथा (ढोंगी) कहनेवाला व्यर्थ ही क्लेश उठाता है, अर्थात् वह उक्त वस्तुओं और आदमियों का कुछ नहीं बिगाड़ सकता।

    दान दरिद्रता का नाश करता है, सुशीलता दुर्गति को दूर कर देती है, बुद्धि अज्ञान का नाश कर देती है और भक्ति भय को मिटाती है।

    काम के समान दूसरी व्याधि नहीं, अज्ञान के समान दुसरा वरी नहीं, क्रोध के समान दूसरी आग नहीं एवं ज्ञान से बढ़कर सुख नहीं।

    यह निश्चित है कि मनुष्य अकेला ही जन्म लेता और मरता है । अपने शुभ और अशुभ कर्मों का फल भी अकेला ही भोगता है। अकेला ही नरक में गिरता है और अकेला ही परम गति मोक्ष को पाता है।

    Great Chanakya Quotes in Hindi Images (81-90)

    ब्रह्मज्ञानी को स्वर्ग तृण समान है, शूर को जीवन तृण तुल्य है । जिसने इन्द्रियों को वश में कर लिया है, उसको स्त्री तृण के तुल्य जान पड़ती है और निःस्पृह को जगत् तृण-सा तुच्छ है।

    विदेश में विद्या मित्र होती है, गृह में भार्या मित्र है, रोगी का मित्र औषधि है, और मरे हुए का मित्र धर्म है।

    समुद्रों में वर्षा वृथा है, भोजन से तृप्त हुए को भोजन निरर्थक है, धनी को दान देना और दिन में दीपक जलाना व्यर्थ है।

    मेघ के जल के समान दूसरा जल नहीं होता। अपने बल के समान दूसरे का बल नहीं; क्योंकि समय पर वही काम आता है। अथवा आत्मा का बल शरीर के बल से बढ़कर है । नेत्र के समान दूसरा तेज (ज्योति) नहीं है और अन्न के सदृश दूसरा प्रिय पदार्थ नहीं है।

    धनहीन धन चाहते हैं । पशु वचन की, मनुष्य स्वर्ग की और देवता मुक्ति की इच्छा रखते हैं।

    सत्य से पृथ्वी स्थिर है, सत्य ही से सूर्य तपते हैं, सत्य ही से वायु बहता है और सब सृष्टि सत्य ही में स्थिर है।

    लक्ष्मी, प्राण, जीवन और घर ये सभी स्थिर नहीं हैं। यह निश्चय है कि इस चर-अचर संसार में केवल धर्म ही निश्चल है।

    जन्म देने वाली यज्ञोपवीत आदि संस्कार करने वाला, विद्या देनेवाला, अन्न देनेवाला और भय से बचानेवाला; ये पाँच पिता गिने जाते हैं।

    राजा की भार्या, गुरु की स्त्री, मित्र की पत्नी, सास और अपनी जननी, इन पाँचों को माता कहते हैं।

    निर्धन होने से कोई धनहीन नहीं गिना जाता, किन्तु तो धनवान होते हुए भी विद्यारत्न से हीन हैं, वो सब वस्तुओं से हीन हैं ।


    दोस्तों, हमें उम्मीद है आपको ये सब Chanakya Quotes in Hindi पसंद आये होंगे. इन्हें अपने दोस्तों के साथ शेयर जरुर करें.

    हालांकि ऊपर दिए गये इन चाणक्य उद्धरणों में कुछ त्रुटियां हो सकती हैं, हमारा इरादा चाणक्य नीति से सर्वश्रेष्ठ सुविचारों और जीवन के महत्त्वपूर्ण सबक शेयर करना है और इसमें कुछ विवादित विचार भी शामिल हो सकते हैं। चाणक्य नीति चाणक्य के प्रसिद्ध कार्यों में से एक है। मुझे विश्वास है कि आप इन विचारों से कुछ सीखेंगे और अपने जीवन को बेहतर, सफल और पूरा करेंगे।

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