Questions

गंगा को पवित्र क्यों कहा जाता है?

एक बार किसी विदेशी ने एक भारतीय संत से पूछा, यमुना और सरस्वती का जल पवित्र कहा जाता है, तो गंगा जल क्या है? उस संत ने तुरन्त उत्तर दिया, गंगा का जल तो अमृत है। गंगा को देवी-देवताओं की नदी कहते हैं। इसके जल में कभी कीडे नहीं पड़ते। इसका उद्गम स्थल उत्तराखंड में पवित्र ‘गौमुख’ है जिस कारण इसका जल सबसे पवित्र और अमृत माना जाता है।

सिन्दूर क्यों?

विवाहित स्त्रियों को अपनी मांग में सिंदूर भरने का विधान है। फैशन के कारण सिंदूर का चलन कम होता जा रहा है, पर वास्तव में लाल सिंदूर का अपना शारीरिक प्रभाव होता है। वह स्त्री की (वासना) कामना पर नियंत्रण रखता है और उसके स्वभाव में उत्तेजना नहीं आने देता है।

उसको रक्तचाप की बीमारी से भी बचाता है। इसी प्रकार का कुछ-न-कुछ प्रभाव उसके आभूषण और शृंगार के द्वारा भी होता है।

हवन यज्ञ क्यों? हवन-यज्ञ आदि केवल धार्मिक संस्कार या पूजा-पाठ मात्र नहीं हैं। हवन सामग्री का विश्लेषण करने से पता चला है कि उन तमाम वस्तुओं के जलने से जो धुआ निकलता है, वह पर्यावरण को शुद्ध करता है। आज पर्यावरण का प्रदूषण एक भयानक समस्या बन गयी है। हवन-यज्ञादि की आहुति से अभूत धुआं पर्यावरण को शुद्ध करता है। इसे ढकोसला मानकर घरों में अब प्रतिदिन को यह बतलाया गया संस्कार लगभग समाप्त हो गया है।

शुद्धि क्यों आवश्यक है?

बुद्धि के विषय में स्वयं भगवान मनु कहते हैं अद्भि गात्राणि शुष्यन्ति मनः सत्येन शुध्यति। विद्या तपोभ्यां भूतात्मां, बुद्धिज्ञानेन शुध्यति॥ शरीर, वस्त्र, भवन आदि की बाहरी शुद्धता जल के द्वारा होती है, मन सत्य के द्वारा शुद्ध होता है, उच्चकोटि के उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए किये गये पुरुषार्थ को तप कहते हैं। इस तप तथा विद्या से आत्मा शुद्ध होती है तथा बुद्धि ज्ञान के द्वारा शुद्ध होती है। इस प्रकार शुद्ध जल, सत्याचरण, तप, विद्या एवं ज्ञान के द्वारा अपने को पवित्र बनाना शौच कहलाता है। ‘राग-द्वेष छोड़कर भीतर और जलादि से बाहर पवित्र रखें । धर्म से पुरुषार्थ करने से लाभ में प्रसन्नता और हानियों में न प्रसन्नता करें। प्रसन्न होकर आलस्य छोड़कर सदा पुरुषार्थ क्या करें। सदा सुखों-दु:खों को सहन और धर्म का ही अनुष्ठान करें, अधर्म का नहीं। सर्वदा शास्त्रों को पढ़े-पढ़ाये-सत्पुरुषों का संग करें और ‘ओ३म्’- इस पर परमात्मा के नाम का अर्थ विचार करें, नित्यप्रति जप किया करें। अपनी आत्मा को परमेश्वर की आज्ञानुकूल समर्पित कर दें।’ इन पांच प्रकार के नियमों को मिलाकर उपासना योग का दूसरा अंग कहलाता है जब उपासना करना चाहे तब एकान्त में जाकर, आसन लकर, प्राणायाम कर बाहरी विषयों से इंद्रियों को रोक, मन को नाभि प्रदेश व हृदय, कण्ठ, नेत्र, शिखा अथवा पोत के

मध्य हाड़ में किसी स्थान पर स्थिर कर अपनी आत्मा और परमात्मा का विवेचन करके परमात्मा में मग्न होकर संयमी हे। प्रभु को प्राप्त करने के लिए युद्ध आवश्यक है।

जन्म और मृत्यु क्यों?

सृष्टि में तीन प्रश्न महत्वपूर्ण हैं हम क्यों जन्म लेते हैं? हम कैसे जन्म लेते हैं? मृत्यु के पश्चात् हम वहां जाते और कैसे रहते हैं? वेदांत में इनका एक ही उत्तर है जिसमें ये तीनों बातें विलीन हो जाती हैं, उसे जानों। वह क्या हैं? कौन हैं? वह ब्रह्म है। वह ब्रह्म जो चेतन बुद्धि तत्व है। वह सर्वव्यापी, आनंदमय, ज्योति, पुराण, सृष्टि, सृष्टि और सच्चिदानंद है। उसका आदि है, न अंत। वह सम्पूर्ण, निराकार, निर्गुण, निष्कलंक, निर्लेप शाश्वत, सर्वज्ञ , सदा संतुष्ट, पवित्र, ज्ञान से पूर्ण स्वतंत्र, विवेक और आनन्द है। सृष्टि का निमित्त कारण ब्रह्म है। वही एकमात्र सृष्टिकर्ता है। प्रकृति, उपादान कारण और ब्रह्म निमित्त कारण है।

अब प्रश्न यह उठता है कि क्या पहले असत् ही था? असत् में सत् विस प्रकार उत्पन्न हुआ? असत् ब्रह्म का प्रतीक कैसे बन गया?

बंधन और मोक्ष साथ-साथ रहते हैं। जैसे ही यह प्रश्न उठाया जाता है-कौन बंधा है? बंधन लुप्त हो जाता है। मोक्ष भी। और इस आत्म-ज्ञान के होते ही मनुष्य सदैव के लिए मुक्ति पा जाता है। ज्ञानम बिना मोक्षो न सिद्धयति। आत्म-ज्ञान के बिना मोक्ष नहीं। वेदांत का कहना है-मन एवं मनुष्यानाम कारणम् बंध मोक्षयोः (केवल मस्तिष्क ही बंधन और मोक्ष का कारण है।)

इस प्रकार हमारे पूर्वजों ने इंसान को ब्रह्माण्ड के अंदर लघु अण्ड के रूप में जाना। गीता में कहा गया-उद्धोदात्मनात मानस। अपनी आत्मा को स्वयं ऊपर उठाओ। अपने प्रयत्नों से उठाओ। तभी लघु ब्रह्माण्ड एकाकार हो जायेगा ब्रह्माण्ड से। यही इंसान की जीवन-यात्रा का लक्ष्य है। गंतव्य है। महासत्य है। वेदों में यही सत्य उजागर किया गया है। हमारे ऋषियों को मंत्रदृष्टा कहा जाता है-और इसलिए वेद इंसान को चैतन्य बनाते हैं और जन्म, मृत्यु का सत्य ज्ञान कराते हैं।

गऊ का दूध सबसे उत्तम आहार क्यों है?

हमारे शास्त्रों और ऋषि-मुनियों के अनुसार गऊ में देवी-देवताओं का वास माना जाता है। गऊ को माता का स्थान प्राप्त है। भारतवर्ष में गऊ, गंगा, गायत्री और जन्म देने वाली स्त्री को माता का स्थान प्राप्त है। पौष्टिक एवम् सतोगुण प्रधान गाय का दूध देवी-देवताओं को चढ़ाया जाता है। धर्मशास्त्र में में गौ-दूध को शुद्ध माना गया है। गाय के दूध के सेवन से रोग नष्ट हो जाते हैं। यह स्थूलता और मेदा वृद्धि को भी दूर करता है। इसमें प्रोटीन एवम् विटामिन उचित मात्रा में पाया जाता है जो शिशुओं के लिए अति उत्तम है। मां के दूध के पश्चात् डॉक्टर बच्चों को गाय का दूध पिलाने का परामर्श देते हैं।

सूर्य को अर्घ्य (जल) देने का कारण स्पष्ट करें

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सूर्य को जल दिया विना अन्न (भोजन) ग्रहण करना पाप है। अलंकारिक भाषा में वेद कहते हैं कि सन्ध्या के समय सूर्य को दिये गये अध्ध्य के जलकण वन बनकर असुरों का नाश करते हैं । विज्ञान की दृष्टि में ये असुर कौन है? मनुष्यों को प्रताड़ित करने वाले ये असुर कौन है? ये असुर हैं-टायफाइड, निमोनिया, राजलक्ष्मा आदि रोग जिनको नष्ट करने की दिव्य शक्ति सूर्य की किरणों में होती है। ऐन्थ्रैक्स के वायरस को कई वर्षों के शुद्धिकरण से नहीं मरते वे सूर्य की किरणों से एक-डेढ़ घंटे में मर जाते हैं। हैजा, निमोनिया, चेचक आदि के कीटाणु पानी में डालकर उबालने पर नहीं मरते किन्तु सूर्य की प्रभातकालीन किरणों में शीघ्र नष्ट करने की दिव्य शक्ति सूर्य की किरणों में होती है सूर्य को अर्ध्य देते समय साधक के ऊपर सूर्य की किरणें सीधी पड़ती हैं। शास्त्र अनुसार प्रात:काल पूर्व की ओर मुख करको तथा संध्या के समय पश्चिम की ओर मुख करके जल देना चाहिए। जल के पात्र (लोटे) को छाती के बराबर ऊंचाई रखकर जल गिराया और लौटे के उभरे भाग को तब तक देखते रहें जब तक जल न समाप्त हो जाये ऐसा करने से आंखों में मोतियाबिन्द नहीं होता। भगवान से क्यों मांगना चाहिए?

यह कलियुग है। यहां सारे काम उल्टे होते हैं। सभी लोग ‘गुरु’ बनना चाहते हैं। सबको गुरु बना दिया और वह अर्थ कहा चला गया कि ‘गु’ नाम अंधकार, ‘रु’ नाम प्रकाश। जो अंधेरे से उजाले में लाए, वह गुरु कहां गया?
मरने के पश्चात् क्या होगा, यह सारे धर्म कहलाते हैं। कहते हैं कि अच्छा कर्म करोगे तो मरने के पश्चात् तुम ‘वहां’ जाओगे। ‘वहां’ जाओगे तो तुम्हारे साथ तुम्हारा कर्म होगा। यही है स्वर्ग और यही है नरक और यही यह शरीर है। वह आत्मा भी है जिससे हम हंस सकते हैं। अगर सुख और शांति चाहिए तो आज चाहिए, कल नहीं।’ अतिथि का सत्कार कैसा होना चाहिए? यह तुम जानते हो। पर तुम यह बात भूल चुके हो कि तुम भी एक अतिथि हो और तुमको इस अतिथि का सत्कार कैसे करना है-यह तुम भूल चुके हो। यह आत्मा ‘जीव’ भी एक अतिथि है। इसका भी आदर-सत्कार होना चाहिए। प्यास है तो इस अतिथि को पानी पिलाओ और कैसा जल? अमृत जल। भगवान के पास लोग जाते हैं, प्रार्थना अथवा निवेदन करते हैं-‘हे भगवान, तू यह कर दे, मेरे लिए वह कर दे। अरे तू ईमानदारी से अपना काम कर , परन्तु भगवान से जो मांगने की वस्तु है, वह तो दुनिया मांगती नहीं। मैं क्या मांगू? सत्-चित्त-आनंद से मैं क्या मांगू? क्या रोटी? वह तो अखिल विश्व को रोटी देने वाला है। आज अगर कोई भूखा रह जाता है तो उसके अपने कर्म हैं। क्या मांगना चाहिए? सच्चिदानंद से क्या मांगेगे। तो सत्-चित्त-आनन्द से वह आनंद मांगो, जो आनंद सदैव बना रहे। जो चीज जहां लगनी चाहिए जो ध्यान जहां लगना चाहिए, वह वहां लगा रहे। ध्यान तो अपने काम में लगाओ-पर जो भीतर की चेतना है, उसे वहां जाने दो जहां वह जाना चाहती है। कहां जाना चाहती है? उस जगह जाना चाहती है जहां उसको दिव्य आनंद मिले। इसलिए भगवान से अगर कुछ मांगना ही है तो वह आनंद मांगों जिसके लिए हृदय प्यासा है। जिस आनंद की तुम्हें तलाश है वह आनंद पहले से ही तुम्हारे भीतर है, बाहर भटकने की आवश्यकता नहीं। ‘अंत: भगवान से भौतिक सुख ही परम सुख मांगो।

क्यों की जाती है पीपल की

पूजा?

दधीचि पुत्र पिप्पलाद ने जब माता से अपने पिता की देवताओं द्वारा अस्थियां मांगे जाने और उनके बने वज्र से अपने प्राण बचाने की पौराणिक विवरण सुनी, तो उन्हें देवताओं के प्रति घृणा उपजी। अपना स्वार्थ साधने के लिए दूसरों के प्राण हरण करने का छल करने वाले यह देवता कितने नीच हैं। इनसे पिता को सताने का बदला लूंगा। पिप्पलाद तय करने लगे। कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए और बोले-“वर मांगें।” पिप्पलाद ने नमन किया और बोले, प्रभु! अगर आप प्रसन्न हैं, तो अपना रुद्र रूप प्रकट कीजिए और इन देवताओं को जलाकर भस्म कर दीजिए। शिव स्तब्ध रह गये, पर वचन तो पूरा करना ही था। देवताओं को जलाने के लिए तीसरा नेत्र खोलने का उपक्रम करने लगे। इस आरम्भ की प्रथम परिणति यह हुई, कि पिप्पलाद का रोम-रोम जलने लगा। वे चिल्लाये-“बोले, प्रभु! यह क्या हो रहा है? देवता नहीं, उल्टा मैं ही जला जा रहा हूं।

शिव ने कहा- “देवता तुम्हारी देह में ही समाये हुए है। अवयवों की शक्ति उन्हीं की सामर्थ्य है। देव जलें और तुम अछूते बचे रहो यह तो संभव नहीं है। पिप्पलाद ने अपनी याचना वापस ले ली। शिव ने कहा-“देवताओं ने त्याग का अवसर देकर तुम्हारे पिता को कृत-कृत्य और तुम्हें गौरवान्वित दिल है। मरण तो होता ही, न तुम्हारे पिता बचते न काल के ग्रास के वृत्रासुर बचा रहता। यश गौरव प्राप्त करने का लाभ प्रदान करने से लिए देवताओं के प्रति कृतज्ञ होना ही उचित है। पिप्पलाद का भ्रम दूर हो गया| उनकी तपस्या आत्म-कल्याण की दिशा में मुड़ गई। पिप्पलाद को ही पीपल कहते हैं । उनके त्याग, साधना और परोपकार की भावना के कारण उन्हें पूजा जाने लगा। पीपल समस्त वृक्षों में सबसे पवित्र इसलिए माना गया है क्योंकि स्वयं भगवान श्री हरि विष्णु जी पीपल में निवास करते हैं। श्रीमद्भागवत गीता में स्वयं भगवान कृष्ण अपने श्रीमुख से उच्चारित किये हैं कि वृक्षों में मैं ‘पीपल हूं।’ स्कन्द पुराण के अनुसार, पीपल के मूल (जड़) में विष्णु, तने में केशव, शाखाओं में नारायण, पत्रों में भगवान हरि, और फलों में समस्त देवताओं से युक्त भगवान सदैव निवास करते हैं। ऑक्सीजन ‘प्राणवायु’ कही जाती है। प्रत्येक जीवधारी ऑक्सीजन लेता है और कार्बन डाई-ऑक्साइड छोड़ता है। ऑक्सीजन देने के अतिरिक्त पीपल में अन्य अनेक विशेषताएं: हैं जैसे इसकी छाया सर्दी में गर्मी देती है और गर्मी में शीतलता देती है। इसके अतिरिक्त पीपल के पत्तों में स्पर्श करने से वायु में मिले संक्रामक वायरस नष्ट हो जाते हैं। आयुर्वेद के अनुसार इसकी छाल, पत्तों और फल आदि से अनेक प्रकार की रोगनाशक दवायें हैं। इस सृष्टि से भी पीपल पूज्यनीय है।

क्या जल भी देवता है?

हमारी संस्कृति में वायु को भी देवता माना गया है। उपनिषदों में वायु की देवी शक्ति की संकल्पना का वर्णन है और कहा गया है कि वायु ही प्राण बनकर शरीर में वास करती है। वेदों में वायु को औषधीय गुणों से युक्त माना गया है। वैदिक ऋषियों द्वारा जल की प्राप्ति के लिए भी कामना की गयी है। अथर्ववेद के भूमि सूक्त में उल्लेख भी आया है| नदियों के विषय में कहा गया है कि गंगा के दर्शन मात्र से मुक्ति मिल जाती है। जल को इतनी महत्ता प्रदान की गयी है कि जलस्त्रोतों में प्रातः काल स्नान करने से पहले सो रही गंगा को जगाया जाता है, तब उनमें स्नान किया जाता है और स्नान करने से पूर्व उनके जल को ललाट पर लगाया जाता है।

पूजा में शंख क्यों फूका जाता है?

धर्मग्रन्थों में शंख को विजय, सुख, समृद्धि के साथ-साथ यश देने वाला भी बतलाया गया है। तांत्रिक पूजा में दक्षिणावर्ती शंख का विशेष माहात्म्य है। अथर्ववेद के चौथे काण्ड में ‘शखमणि सूक्त’ के अन्तर्गत शंख की महिमा का वर्णन है। शंख को रक्षक, अज्ञान, और निर्धनता। को दूर करने वाला आयुवर्धक तथा राक्षस और भूत- त-प्रेतों को दूर करने वाला कहा जाता है। आध्यात्मिक दृष्टि से भी शंख का महत्व है ही, अब वैज्ञानिकों ने भी इसके महत्व को स्वीकार कर लिया है। वैज्ञानिकों का मानना है कि शंख की ध्वनि जहां तक जाती है वहां तक वे विषाणु या तो नष्ट हो जाते हैं या मूरच्छित हो जाते हैं। शंख फूंकने से फेफड़े मजबूत होते हैं और हृदय से सम्बंधित कोई रोग भी नहीं होता। बांझपन से ग्रस्त स्त्री अगर नियमित रूप से इसके जल का सेवन करे तो उसके संतानवती होने की संभावना प्रबल होती है।

महाभारत में युद्ध के आरम्भ, युद्ध के समाप्त होने आदि अवसरों पर शंख-ध्वनि करने का वर्णन आया है। इसके साथ ही पूजा, आरती, कथा, धार्मिक अनुष्ठानों आदि के आरंभ व अंत में भी शंख-ध्वनि करने का विधान है। इसके पीछे धार्मिक आधार तो है ही, वैज्ञानिक रूप से भी इसकी प्रामाणिकता सिद्ध हो चुकी है। इस मामले में वैज्ञानिकों का मानना है कि शंख-ध्वनि के प्रभाव से सूर्य की किरणें बाधक होती हैं। अतः प्रातः व सायंकाल में जब सूर्य की किरणें निस्तेज होती हैं, तभी शंख-ध्वनि करने का नियम है। इससे पर्यावरण शुद्ध रहता है। अथर्ववेद के अनुसार, ‘शंख हत्वा रक्षांसि’ अर्थात् शंख से सभी राक्षसों का नाश होता है और यजुर्वेद के अनुसार ‘अवरस्परायशखध्वम्’ अरथात् युद्ध मं शत्रुओं का हृदय दहलाने के लिए शंख फूकने वाला व्यक्ति आवश्यक है।

यजुर्वेद में ही यह भी कहा गया है कि ‘यस्तु शंखवनि कुर्यात्पूजाकाले’, विशेषतः, ‘वियुक्तः सर्वपापेन विष्णुना सह मोदते’ अर्थात् पूजा के समय जो व्यक्ति शंख ध्वनि करता है, उसके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। आयुर्वेद के अनुसार शंख फूकने वाले को सांस से सम्बंधित रोग जैसे-दमा आदि एवं फेफड़ों के रोग नहीं होते हैं। रुक-रुककर बोलने वह हकलाने वाले अगर नित्य शंख जल का पान करें, तो उन्हें लाभ मिल सकता है। वास्तव में मूकता व हकलापन दूर करने के लिए शंख-जल एक उपयोगी औषधि है। ब्रह्मवैवर्तपुराण के अनुसार शंख में जल भरकर देवस्थान में रखने और इसे घर के आसपास छिड़कने से वातावरण शुद्ध रहता है। इसके अतिरिक्त शंख में रखे जल से प्रभु को स्नान कराकर अगर कोई गर्भवती उसका पान करे, तो कभी भी मूक बालक जन्म नहीं लेता है। धार्मिक अनुष्ठानों के पश्चात् वहां उपस्थित लोगों पर शंख में रखा हुआ जल क्यों छिड़का जाता है? इसका उत्तर है कि शंख में गंधक, फॉस्फोरस एवं कैल्शियम जैसे पदार्थ काफी मात्रा में रहते हैं। अत: शंख में जल भरकर कुछ समय तक छोड़ देने से इसमें रखा जल रोगाणुरहित हो जाता है। यही कारण है कि वह जल लोगों के ऊपर छिड़का जाता है।

घर में शंख रखने से क्या लाभ हैं?

गोरक्ष संहिता, विश्वामित्र, संहिता, पुतस्त्य संहिता आदि ग्रन्थों में दक्षिणावर्ती शंख की महिमा बताई गई है। शंख को दरिद्रता नाशक, आयुवर्धक, समृद्धि देने वाला कहा गया है। दक्षिणावर्ती शंख जिसके घर में रहता है. वहां लक्ष्मी स्वयं निवास करती हैं।

जो व्यक्ति दक्षिणावर्ती शंख की चन्दन और देशी कपूर से पूजा करता है, वह सौभाग्यशली बन जाता है। जो व्यक्ति प्राण-प्रतिष्ठा युक्त दक्षिणावर्ती शंख अपने घर में स्थापित करता है, निर्धनता उससे कोसों दूर भाग जाती है और भाग्य में वृद्धि होती है। इस शंख की महिमा और गुणों के सन्दर्भ में ब्रह्मवैवर्त पुराण में कहा गया है

अर्थात् शंख चन्द्र और सूर्य के समान है, इसके मध्य में वरुण, पृष्ठ भाग में ब्रह्मा तथा अग्रभाग में गंगा और सरस्वती का निवास है। तीनों लोकों मे जितने भी तीर्थ हैं, विष्णु आज्ञा से शंख में निवास करते हैं। शंख के दर्शन मात्र से सभी प्रकार के पाप नष्ट हो जाते हैं।

हमारे ऋषि-मुनि दूरदृष्टा के साथ-साथ तत्वदृष्टा भी थे। उन्होंने इस शंख के तत्व की अद्भुत शक्ति को पहचानकर ही घर में स्थापित कर पूजा और दर्शन करने के निर्देश दिए हैं। ‘अकाले मरणं नास्ति’ अर्थात् शंख के प्रभाव से अकाल मृत्यु नहीं होती है। दिन के दूसरे पहर में शंख की पूजा करने से ‘धन वृद्धि’ होती है। शंख की चतुर्थ पहर पूजा करने से संतान प्राप्ति होती है।

चैतन्य और प्राण-प्रतिष्ठा युक्त शंख जहां रहता है, दरिद्रता समाप्त हो जाती है। इसके प्रभाव से व्यक्ति के मान-सम्मान में वृद्धि होती है। इसके दर्शन मात्र से ही अभिशाप और दुरग्रह के प्रभाव समाप्त हो जाते हैं। शाकिनी भूत, बेताल, पिशाच और ब्रह्मराक्षस दूर भाग जाते हैं। शंख के भीतर चांदी का सिवका अथवा अक्षत अवश्य रखें। फूल अर्पित करें तथा मिश्री का भोग लगाएं। कमलगट्टे या स्फटिक की माला में नित्य मंत्र जप करें। शंख जो चैतन्य हो, घर के पूजा स्थल पर चावल की कटोरी को इस प्रकार स्थापित करें कि शंख का पूंछ वाला भाग साधक की ओर न रहे। नित्य शुद्ध केसर का टीका लगाए तथा धूप-दीप अर्पित करें। नित्य मंत्र का जाप करें ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ब्लूं दक्षिणमुखाय शंख नि वै समुद्रप्रभवाय नमः।

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं श्रीधर करस्थाय पयोनिधि जाताय श्री दक्षिणावर्त शंखाय ह्रीं श्रीं क्लीं पूज्याय नमः।

विवाह कितने प्रकार के होते हैं?

शास्त्रों के अनुसार विवाह आठ प्रकार के होते हैं-ब्रह्मा, देव, आर्यन, प्रजापत्य, असुर, गन्धर्व, राक्षस और पैशाचा इसमें प्रथम चार प्रकार के विवाह श्रेष्ठ कहे गये हैं। अन्तिम चार निकृष्ट कहे गये हैं। विवाह मण्डप में बांस के पांच हरे स्तम्भ क्यों लगाये जाते हैं और ऊपर सरपत का छप्पर क्यों डाला जाता है?

मण्डप बनाते समय एक-एक बांस प्रत्येक कोने पर तथा पांचवां बांस मध्य में लगाया जाता है। प्रत्येक बांस का जड़ में एक-एक देवता का स्थान मानकर ऐसा करते है।

चारों दिशाओं में वर-वधू की रक्षा के लिए देवताओं का पूजन किया जाता है। पंच देवताओं का आह्वान-पूजन करके मध्य बांस के नीचे धरती में स्थापित करते हैं। जिसका अर्थ यह होता है कि वर-वधू कहीं भी रहें, ये पांचों देवता उनकी सदैव रक्षा करें।

विवाह में सिन्दूर दान’ क्यों सर्वोत्तम माना गया है?

भगवान श्री राम राजा जनक द्वारा आयोजित किये गये स्वयंवर में शिव के धनुष को तोड़कर सीता को प्राप्त किया और सीता ने श्री राम जी के गले में वरमाला डालकर उन्हें पति रूप में स्वीकार किया, तदुपरान्त राजा जनक ने आयोध्या के राजा दशरथ को संदेश भेजा, तब वे अयोध्या से बारात लेकर जनकपुर गए तब फिर दोनों पक्षों की उपस्थिति में वैदिक रीति से ब्राह्मणों द्वारा, मंत्रोच्चार के मध्य विधिपूर्वक श्री राम ने सीता की मांग में सिन्दूर भरा, जिसे ‘सिन्दूर दान’ कहते है। माना जाता है कि सिन्दूर दान के पश्चात् ही विवाह की पूर्णता होती है। महिलाओं में माथे पर कुमकुम (बिंदी ) लगाने के अतिरिक्त मांग में सिन्दूर भरने की प्रथा अति प्राचीन है। यह उनके सुहागिन होने का प्रतीक तो है ही, साथ ही इसे मंगलसूचक भी माना जाता है। सुहागिनों के ललाट पर जहां कुमकुम लगा होता है, वह बिंदु और जहां वे मांग भरती हैं, उस स्थान पर शास्त्रों में अनेक सौभाग्य का लक्षण माना जाता है। ज्योतिष शास्त्रों में लाल रंग को काफी महत्व दिया गया है? क्योंकि यह मंगल ग्रह का प्रतीक है। सिंदूर का रंग भी लाल ही होता है, अत: इसे मंगलकारी माना जाता है। शास्त्रों में इसे लक्ष्मी का प्रतीक भी कहा गया है। स्त्रियों द्वारा मांग में सिन्दूर भरने का प्रारम्भ विवाह संस्कार के पश्चात् से होता है। विवाह के समय प्रत्येक वर अपनी वधू की मांग में सिन्दूर भरता है। विवाह के मध्य संपन्न होने वाला यह एक प्रमुख संस्कार है। पति की मृत्यु हो जाने पर वे मांग भरना बंद कर देती हैं। वास्तव में स्त्रियां अपनी मांग में जिस स्थान पर सिंदूर भरती हैं, वह स्थान ब्रह्म रंध्र व असि नामक मर्म के ठीक ऊपर का भाग हैं स्त्री के शरीर का यह भाग पुरुष के शरीर के इस भाग की अपेक्षा बहुत अधिक संवेदनशील होता है, जिसकी रक्षा करना आवश्यक है। ऐसी मान्यता है कि इस स्थान पर सिंदूर भरने से उसकी रक्षा हो जाती है। अगर इसके वैज्ञानिक पक्ष को देखें, तो यह स्पष्ट होता है कि सिंदूर जिन पदार्थों के मिश्रण से बनता है, उसमें अन्य चीजों के अलावा पारा जैसी धातु काफी मात्रा में होती है। सिंदूर में उपस्थित पारा इसका उपयोग करने वाली महिला के शरीर मे न केवल वैद्युतिक उत्तेजना को नियंत्रित रखता है, बल्कि कर्म स्थान को बाहरी दुष्प्रभावों से भी सुरक्षित करता है।

स्त्री पूजन की अधिकारी क्यों?

दुर्गा का स्मरण करते ही शक्ति का, लक्ष्मी से धन-वैभव, सरस्वती से विद्या और सीता से सहिष्णुता का आदर्श ध्यान में आता है। (भारतवर्ष में जो कुछ पवित्र है, पावन है, उन सबका ‘सीता’ शब्द से बोध हो जाता है।) तभी तो कुलवधू को आशीर्वाद देते हुए कहते हैं, सदा सुहागिन रहो। पतित पावन गंगा हो या शक्ति की प्रतीक दुर्गा, धन की देवी लक्ष्मी हो या फिर विद्या की देवी सरस्वती, शांत सीता हो या संहार करने वाली काली… सभी हमें बहुत कुछ सिखाती हैं। शिव के अर्द्धनारीश्वर रूप में नर-नारी की महत्ता हमारी संस्कृति की विरासत है। ऋषिगण आचार्य वशिष्ठ की पत्नी अरुंधति के पास जाकर धर्म सम्बंधित प्रश्नों का उत्तर पाते थे। वेद-पुराण, रामायण-महाभारत जैसे ग्रंथों की प्रसांगिकता आज के संदर्भ में पुनः जीवंत होने का भेद यही है। विश्व के सभी महान् लोग इस तथ्य को स्वीकार करते हैं कि केवल व्यक्ति ही नहीं वरन् समाज का विकास भी स्त्री शक्ति की प्रतिष्ठा से ही संभव है। फारसी के एक कवि ने लिखा है, ‘जेरे कदमे वाल्दा, फिरदौसे वरी’ अर्थात् मां के चरणों के नीचे ही स्वर्ग है। इसमें मां के महत्व को रेखांकित किया गया है। यहूदी भाषा में एक कहावत है कि प्रभु पत्येक स्थान पर उपस्थित नहीं हो सकता, इसलिए माताओं को भेद देता है। यह स्त्री के प्रति श्रद्धा की अभिव्यक्ति है।

अच्छे चरित्र की आवश्यकता

क्यों पडती है?

चरित्र का महत्वपूर्ण अंग है-समता। जब-जब विषमता बढ़ती है तब-तब समाज में अराजकता पनपती है, मनुष्य का स्वभाव है कि वह दूसरे को हीन देखने में अधिक रस लेता है। यह प्रकृति का स्वभाव है कि जब-जब मनुष्य दूसरे को हीन मानने लगता है, तब चक्र उल्टा चलने लगता है। हीन मानने वाला नीचे चला जाता है और जिन्हें हीन माना जाता है, वे ऊपर आ जाती हैं। समानता की अनुभूति चरित्र का मुख्य अंग है। जातिभेद, वर्णभेद, रंगभेद, वर्गभेद-ये सारी विशेषताएं हैं। इन्हें दूर किए बिना मनुष्य जाति अपनी निर्मलता के साथ जी नहीं सकती। हमारे ऋषि-मुनियों ने सभी के लिए एक आचार-संहिता प्रस्तुत की थी। चरित्र की इतनी व्यवस्थित आचार-संहिता अन्यत्र दुर्लभ है। वह पूर्ण व्यावहारिक है। समाज में रहने वाला हम कोई भेद करना चाहें तो यह भेद-रेखा खींची जा सकती है कि चरित्र का सम्बंध व्यक्ति से है और नैतिकता के लिए दो व्यक्ति चाहिए, परस्परता चाहिए। एक व्यक्ति दूसरे के प्रति जो व्यवहार करता है, उसके साथ नैतिकता जुड़ी हुई होती है। चरित्र अकेले भी हो सकता है। मैत्री का भाव, राग-द्वेष मुक्त चेतना का भाव अकेले में भी हो सकता है। नैतिकता के लिए कम से कम दो व्यक्ति चाहिए।

चरित्र और नैतिकता दोनों परस्पर जुड़े हुए हैं। चरित्रहीन व्यक्ति स्वयं में असंतुष्ट होता है। नैतिकता विहीन व्यक्ति स्वयं में उतने असंतोष का अनुभव न भी करे, किन्तु समाज के लिए असंतोष उत्पन्न करता है। धर्म सार्वभौमिक तत्व है। आज के मनुष्य में पारलौकिक धर्म को अस्वीकार-सा कर रखा है। वर्तमान जीवन के प्रति उसकी जितनी आस्था है उतनी पारलौकिक के प्रति नहीं है। जो नहीं के प्रति उसे जबरदस्ती लाया नहीं जा सकता। धर्म केवल पारलौकिक ही नहीं है। वह वर्तमान जीवन में परिवर्तन लाता है। वर्तमान जीवन में धर्म की बहुत बड़ी आवश्यकता है।

क्या अशांति का प्रश्न धर्म से, चरित्र से, अचरण से जुड़ा नहीं है? क्या युद्ध और आतंक-ये सब इसलिए चल रहे हैं कि मनुष्य ने धर्म को अस्वीकार किया है। अशांति की समस्या को तब तक नहीं सुलझाया जा सकता जब तक धर्म को चरित्र को स्वीकार नहीं किया जा सकता। चरित्र का अर्थ है-जागरण।

क्या गोमूत्र पवित्र है?

हिन्दू धर्म के अनुसार गाय को माता ना गया है। गौमाता पवित्र है। उनके मुख का भाग पवित्र माना गया है। अत: गौमूत्र और गोबर दोनों ही पवित्र हैं। गौमूत्र में पारद और गन्धक के तात्विक गुण अधिक मात्रा पाए जाते हैं। गौमूत्र का प्रयोग करने से प्लीहा और यकृत के रोग नष्ट हो जाते हैं। गौमूत्र कैंसर जैसे भयानक रोगों को भी ठीक करने में सहायक है। संक्रमण से उत्पन्न रोग भी ठीक हो जाते हैं।
इस प्रकार गोमूत्र पवित्र और उपयोगी है।

सप्ताह में सात दिन ही क्यों

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होते हैं

भारतीय ज्योतिष शास्त्र में सात ग्रह माने गये हैं और ज्योतिष के जन्मदाता महापंडित रावण कहे जाते हैं जिन्हें भगवान सूर्यदेव के सारथी अरुण ने ज्योति का ज्ञान प्रदान किया था। उसके बाद महापंडित रावण ने ग्रहों का प्रतिपादन किया। सोम, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि और ग्रह के सहयोग से बनता है अर्थात् स्वयं अकेले महत्वहीन है। उपरोक्त सात प्रमुख ग्रहों के नामों के आगे ‘वार’ जोड़कर सप्ताह के सात दिन बने प्रथम ग्रह सूर्य है जिसे रवि (सूर्य का पर्यायवाची है) भी कहते हैं। इस तरह रविवार, सोमवार, मंगलवार, बुधवार, बृहस्पति, शुक्रवार और शनिवार बनें।

मनुष्य को मांस खाना चाहिए लअथवा नहीं खाना चाहिए?

मनुष्य के पास न तो मांसाहारी दांत हैं और न ही आंत। कहने का तात्पर्य यह कि मनुष्य जाति प्राकृतिक रूप स शाकाहारी है, किन्तु अपना जीभ का स्वाद बदलने के लिए लोग मांसाहारी व्यंजन खाते हैं। वस्तुत जो जीभ से चिपकाकर पानी पीने वाले जीव हैं, वास्तव में मांस का भोजन उनके लिए है। प्रकृति ने मांस नोचने के लिए उन्हें नुकीले दांत और मांस को पचाने के लिए आंत प्रदान किये हैं, जैसे कुत्ता, बिल्ली, शेर, बाघ आदि और घूंट -घूंटकर पानी पीने वाले जीव जैसे जीव शाकाहारी होते हैं। जैसे

गाय, भैंस, बन्दर, मनुष्य आदि। मांसाहारी से जीवहत्या को प्रोत्साहन मिलता है जो हमारी संस्कृति, सभ्यता एवम् धर्म के अनुकूल नहीं है।

हिन्दू लोग पूजा-पाठ या अन्य शुभ अवसरों पर स्वास्तिक () का चिन्ह क्यों बनाते हैं? इसका क्या रहस्य है?

स्वस्तिक चिन्ह केवल हिन्दुओं में ही नहीं प्रचलित है अन्य धर्म सम्प्रदाय के लोग भी इसे पवित्र मानते हैं। ईसाइयों में पवित्र क्रास (+) को लोग गले में धारण करते हैं तथा स्वास्तिक को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाये तो ‘धन आवेश’ के रूप में समझ सकते हैं धन आवेश अर्थात् Positive Point दो ऋणात्मक शक्ति प्रवाहों के मिलने से धनात्मक आवेश Plus (+) बना। यह स्वास्तिक का अपभ्रंश ही है। ईसाइयों का क्रॉस है विच्छेद करने पर शब्द मिलता है-करि+आस्य जिसका अर्थ होता है हाथी के मुखवाला। ईसाइयों के प्रसिद्ध शब्द ‘क्राइस्ट’ का सन्धि विच्छेद करने पर तीन शब्द मिलते हैं-कर+आस्य इष्ट। इसका तात्पर्य हाथी के समान मुख वाला होता है। हाथी के समान मुख वाले अग्रपूज्य देव गणेश जी हैं। स्वास्तिक चिन्ह श्री गणेश जी के साकार विग्रह का स्वरूप है। स्वस्तिक की चारों दिशाओं की ओर शुभ संकेत देती हैं। स्वास्तिक ‘श्री’ (लक्ष्मी) का भी प्रतीक है। भगवान विष्णु और धन सम्पत्ति की अधिष्ठात्री देवी का प्रतीक स्वस्तिक है। पूजा-पाठ या अन्य शुभ कार्यों के अवसर पर ब्राह्मण लोग शुभत्व की प्राप्ति के लिए ‘स्वस्तिवाचन’ करते हैं।

विवाह के समय वर-कन्या का गठबंधन (गठजोड़) आवश्यक है, क्यों ?

विवाह संस्कार का प्रतीक रूप गठबंधन है। विवाह के समय या फेरे लेते समय वर के कंधे पर सफेद दुपट्टा रखकर वधू के साड़ी के पल्लू से बांधा जाता है। यही गठबंधन है जिसका अर्थ यह कि अब दोनों एक-दूसरे के जीवन भर के लिए बंध गये। गठबंधन के समय वर के पल्ले में सिक्का (पैसा), हल्दी, पुष्प, दुर्वा (दूब) और अक्षत (चावल) गांठ बांधी जाती है जिसका अर्थ यह है कि धन पर किसी एक का पूर्ण अधिकार नहीं होगा बल्कि खर्च करने में दोनों की सहमति आवश्यक है। पुष्प (फूल) का अर्थ है कि वर-वधू जीवन भर एक दूसरे को देखकर प्रसन्न रहें। हल्दी आरोग्यता का प्रतीकात्मक है। दूर्बा (दूब) का अर्थ यह जानना चाहिए कि नवदम्पत्ति जीवन भर कभी न मुरझायें बल्कि दूर्वा की तरह सदैव हरे-भरे रहें तथा अक्षत (चावल) अर्थात् अन्न यह संदेश देता है जो अन्न कमायें उसे अकेले नहीं बल्कि मिल-जुलकर खायें। परिवार और समाज के प्रति सेवाभाव रखें। अक्षत अन्नपूर्ण का प्रतीक है; अर्थात् घर में अन का भण्डार भरा रहे जिससे परिवार के लोग कभी भूख न रहें।

पूजा करने से पहले लोग स्नान

करते हैं, क्यों?

स्नान करना एक दैनिक क्रिया है। स्नान करने से शरीर स्वच्छ हो जाता है मानसिक क्रिया दुरुस्त रहती है। पूजा-पाठ

में मन लगता है। चित्त शान्त रहता है। स्नान करने से तन (शरीर ) शीतल ( ठंडा ) हो जाता है। परिश्रम से उत्पन्न हुई थकान नष्ट हो जाती है और मन शीघ्र ही एकाग्र हो जाता

है तथा पूजा-पाठ, भजन-कीर्तन में मन लगता है। फर्ज -कीजिए आप थके हुए हैं और आप पूजा करने बैठ गये। थकान से आपका बुरा हाल हुआ जा रहा है तो आपका मन कदापि पूजा करने में नहीं लगेगा या फिर सिरदर्द कर रहा है तो भी आप पूजा-पाठ नहीं कर सकेंगे। अत: पूजा करने से पहले स्नान करना आवश्यक है।

कुछ लोग कहते हैं कि कुत्ते की जीभ में अमृत होता है, क्या सह सत्य है?

कुत्तों की जीभ में अमृत होने का अर्थ इस तथ्य से निकालते हैं कि जब कोई कोई कुत्ता किसी कारण घायल हो जाता है तो वह अपनी जीभ से चाट-चाटकर जख्य को ठीक कर लेता है। सभी कुत्तों का यही हाल है, किन्तु कुत्ते की जीभ जिस जख्म पर नहीं पहुंच पाती उस जख्य में सड़न हो जाती है, कीड़े भी पड़ जाते हैं जबकि जहां वह चाट सकता है वह जख्म बहुत जल्दी ठीक हो जाता है बिना किसी दवा के, इसी से लोग कुत्तों की जीभ में अमृत होने का अर्थ निकालते हैं। जम्हाई लेते समय मुंह पर हथेली

रख लेना चाहिए, क्यों?

जम्हाई लेते समय मुंह पर हथेली रखना पूर्ण रूप से वैज्ञानिक है, क्योंकि जम्हाई के समय एक बार सांसों की तेज वायु बाहर निकलती है फिर तुरन्त उसी वेग से हम वायु को अन्दर खींचते हैं। यदि उस समय हम अपनी हथेली से मुंह को नहीं ढकते तो वायु की तीव्रता के साथ मक्खी, मच्छर या अन्य प्रकार के कीटाणु मुंह के अन्दर आ जायेंगे और पेट में चले जायेंगे। मक्खी, मच्छर या कीटाणु को मुंह में जाने से रोकने के लिए ही हथेली से मुंह को ढक लेने का विधान हमारे ऋषि-महर्षियों और विद्यानों ने बनाया। एक बात और है, यदि हम भरे समाज में बैठे हैं और जम्हाई आ गई, हम अपना मुंह हथेली से नहीं ढके तो यह अच्छा नहीं लगता। कोई कुछ कहता तो नहीं किन्तु इससे असभ्यता जाहिर होती है। जम्हाई आना प्राकृतिक देन है किन्तु उस समय हथेली से मुंह ढक लेना हमारी सभ्यता को प्रदर्शित करती ह

क्यों अपने घर को अपना घर

कहना उचित नहीं है?

जिस छत के नीचे लोग रहते हैं उसे लोग ‘अपना घर कहते हैं। अपने रहने के लिए कोई विशाल भवन बनाता है तो कोई महल का निर्माण करवाता है, क्या वह व्यक्ति उस महल में सदैव स्थायी रूप से रहेगा। उस भवन को महल को वह एक न एक दिन छोड़कर चला जायेगा, तब उस भवन का दूसरा कोई मालिक होगा। फिर उसके जाने के बाद कोई तीसरा मालिक होगा। ऐसे ही एक प्रसंग का दृष्टान्त है। अमेरिका के एक बहुत ही ऊंचे दर्जे के अधिकारी का भवन था। दरवाजे पर हाथ में रायफल लिये एक गेटकीपर खड़ा था तभी एक फकीर उधर से गुजरा। उसकी नजर ऊंचे संगमरमर से बने भवन पर पड़ी। वह ठिठककर रुक गया और गेटकीपर से जाकर बोला-महाशय इस सराय में क्या मैं एक रात के लिए ठहर सकता हूँ? गेटकीपर फकीर की बात सुनकर बहुत कड़वे स्वर में बोला-बाबा! यह सराय नहीं है, हमारे साहब का महल है। गेटकीपर की बात सुनकर फकीर हंसा-महल, कैसा महल? किसका महल? जहां तक मुझे याद है कि यह एक सराय है जहां दूर-दराज के आने वाले मुसाफिर आकर रात बिताते हैं और चले जाते हैं। गेटकीपर को फकीर की बातों पर गुस्सा आ गया और फकीर उस भजन को महल मानने को तैयार ही न था। इस तरह दोनों के बीच तकरार बढ़ गयी और आवाज अधिकारी तक पहुंच गयी। वह अपने कक्ष (कमरे) से निकलकर बाहर आया और पूछने लगा-फकीर बाबा! क्या बात है? फकीर ने एक नजर अधिकारी को देखा और बोला-बेटा! यह ऊंचा मकान जिसमें से तुम निकलकर आये” हो, यह मुसाफिरों की सराय है न और यह बन्दूक वाला (गेटकीपर) इसे कहता है कि मेरे साहब का महल है। तब अधिकारी ने कहा-हां बाबा! बन्दूक वाला सही कहता है। यह मेरा महल है। गलत, सरासर गलत। फकीर बोला-यह महल नहीं, सराय है क्यों बहुत दिन पहले जब मै आया था तो इसमें कोई दूसरा रहता था। अधिकारी ने कहा-वह मेरे पिताजी थे। फकीर पुन: बोला-उसके पहले आया था तो उस समय कोई तीसरा रहता था। अधिकारी ने कहा-वह मेरे दादाजी थे। तब फकीर ने कहा-बेटे! जहां रहने वाले हमेशा बदलते रहते हैं। वह सराय ही तो होता है। यह सुनते ही अधिकारी को फकीर की बातों का अर्थ समझ में आ गया। वह फकीर के पैरों में गिर पड़ा और विनयपूर्वक बोला-आपकी बात सत्य है। यह महल नहीं, सराय है बाबा! आप एक नहीं, जितने दिन रहना चाहो रह सकते हो। अपने अधिकारी की बात सुनकर गेटकीपर अवाक् रह गया जबकि फकीर मुस्कुराता हुआ आगे बढ़ गया। ऐसा ही एक पौराणिक उदाहरण मिलता है। एक बार देवराज इन्द्र अमरावती (चंद्रपुर ) में बहुत ही सुन्दर भवन का निर्माण कराया। जब भवन पूरी तरह बनकर तैयार हो गया, उसकी भली प्रकार से सजावट आदि हो गयी। तब एक दिन उन्होंने ‘नारायण कीर्तन करते हुए जा रहे नारद जी को मार्ग में रोककर कहा-देवर्षि! मैंने एक बहत ही सुंदर महल बनवाया है। कृपा करके मेरे महल का चलकर देखें और बतायें कि कैसा बना है? तब देव नारद ने कहा-पहले तो नारद जी मन ही मन मुस्कुराये। फिर प्रत्यक्ष में बोले-देवराज! मुझे महलों की परख आदि का ज्ञान नहीं है क्योंकि मैं रमता जोगी, बहता पानी’ हूं। मेरा अपना तो कोई महल है नहीं, मुझे क्या पता कि अच्छा या सुन्दर महल कैसा होता है और खराब महल कैसा होता है? हां पृथ्वीलोक पर एक ऋषि रहते हैं जो कई हजार वर्षों से पृथ्वी लोक में निवास कर रहे हैं, आप उनके पास जाइये। वे अवश्य बतायेंगे। उनका नाम ‘लोमश ऋषि’ है। देवराज इन्द्र अपने ऐरावत हाथी पर सवार होकर उसी क्षण लोमश ऋषि के पास गये और प्रणाम करके एक ओर खड़े हो गये। ऋषि ध्यानमग्न थे। देवराज इन्द्र उनकी आंखें खुलने की प्रतीक्षाकरते हुए इधर उधर देखने लगे किन्तु उन्हें लोमश ऋषि का महा क्या एक कुटिया भी न दिखायी दी। जब ऋषि ने आंखें खोली, तब देवराज इन्द्र ने प्रणाम किया और कहने लगे ऋषिवर ‘आपने अपने रहने के लिएये कोई घर नहीं बनाया।

घर! रहने के लिए। कहकर ऋषि हंसे।

हां ऋषिवर! रहने के लिए।

तब लोमश ऋषि ने कहा-इंद्रदेव! यह शरीर नश्वर ( नश्वर होने वाला) है। इसका क्या भरोसा। कब यह शरीर छूट जाये। तो वह बनाया हुआ घर नहीं रह जायेगा। जब वह घर साथ नहीं जायेगा तो क्यों बनायें। तब आश्चर्यचकित होकर इन्द्र ने कहा-ऋषिराज! मैंने तो सुना है आपकी आयु कई हजार वर्ष है। हां! आपने सही सुना है इन्द्रदेव! मेरी आयु बहुत लम्बी है। मनुष्यों का सौ वर्ष देवताओं का एक दिन होता है इसके हिसाब से देवताओं की आयु सौ वर्ष मानी गयी है, देवताओं के सौ वर्ष बीतने के बाद इन्द्र बदल जाते हैं। सौ इन्द्र के बदलने पर ब्रह्मा के सौ वर्ष पूरे होते हैं। ब्रह्मा की सौ वर्ष आयु मानी गयी है। जब एक ब्रह्मा बदलते हैं तब मेरे शरीर का एक लोम (रोयें, बाल) टूटता है। मेरे शरीर के जब सारे लोम टूट जायेंगे तब मेरी मृत्यु हो जायेगी फिर भी मैंने एक कुटिया (झोंपड़ी) भी नहीं बनवायी, क्योंकि जानता हूं कि मुझे भी मरना है फिर झोंपड़ी या महल बनाने में समय क्यों बर्बाद करें। लोमश ऋषि की बातें सुनकर इन्द्र को ज्ञान हो गया और वे बिना कुछ कहे इन्द्रपुरी वापस लौट गये। कुछ लोग अंडे को शाकाहारी भोजन मिलता है। क्या यह सत्य है कि अण्डा शाकाहारी भोजन है? प्रजनन क्रिया ( ) में स्त्री वर्ग और पुरुष वर्ग दोनों के सम्पर्क से यह क्रिया पूर्ण होती है जिसमें पुरुष के शुक्राणु और स्त्री के अण्डाणु से ‘भ्रूण’ का निर्माण होता है फिर उससे बच्चे का निर्माण होता है और समय पूर्ण होने पर बच्चा गभ्र से बाहर आता है। वह पूर्ण बच्चा होता है किन्तु अण्डा अपूर्ण (अधूरा ) भ्रूण होता है; अर्थात अधूरे मास से बाहर आ जाता है और उसके बाद यदि मुर्गी का अण्डा है तो उसे सेती (एक तरह से पालती है) है तब उसमें बच्चा बनता है। और इक्कीस दिन पूर्ण होने पर बच्चा अण्डे के कठोर आवरण को तोड़कर बाहर आ जाता है। लिखने का तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार स्त्रियां गर्भधारण करती हैं तो आरम्भ में दो-तीन महीने तक ‘भूण’ होता है जो दिन-प्रतिदिन बढ़ता है और शिशु का रूप धारण कर लेता है। भ्रूण ही शिशु (बालक) के निर्माण का आरम्भ काल होता है उसी प्रकार ‘अण्डा’ भ्रूण अवस्था में होता है-और भ्रूण की हत्या कानून की दृष्टि में अपराध माना गया है और सामाजिक दृष्टि से पाप। यति कोई भ्रूण का भोजन करे तो वह महापापी होता े क्योंकि जीव के धरती पर आने से पहले मार डालता उसी प्रकार अण्डा भ्रूण अवस्थाम में जीव होता है और जीव की हत्या करके उसके शरीर (मांस आदि से तात्पर्य है) का भोजन मांसाहार की श्रेणी में आता है। इस तरह अण्डे का भोजन मांसाहारी है।

मूर्ति-पूजा क्यों करनी चाहिए?

आराधना-उपासना की पंचम श्रेणी मूर्ति-पूजा है। मनुष्य का चंचल मन इधर-उधर भटकता है। चाहकर भी लोग मन को नहीं रोक पाते। मन की चंचलता को रोकने का एकमात्र साधन है-मूर्ति -पूजा। चंचल मन अगर बिना मूर्ति के स्थिर नहीं हो पा रहा है, तब मूर्ति-पूजा के अतिरिक्त अन्य कोई साधन नहीं है। मूर्ति पर दृष्टि रखने से उस मूर्ति के प्रति श्रद्धा जागृत होती है और वह भावना ही मन की चंचलता को केन्द्रित करती है। महाभारत काल के प्रमाण एकलव्य ने द्रोणाचार्य को गुरु माना जबकि द्रोणाचार्य ने एकलव्य को शिष्य रूप में स्वीकारने से मना कर दिया. फिर भी एकलव्य ने उन्हें गुरु मानकर उनकी मिट्टी की प्रतिमा बनाकर बाण-विद्या सीखी। कहने का उद्देश्य यह है भावना को जगाने के लिए मूर्ति-पूजा आवश्यक है।

तैतीस करोड़ देवताओं की मान्यता क्यों है?

अष्टवसु एकादश रुद्र, द्वादश आदित्य, इन्द्र और प्रजापति नाम से तैंतीस संख्या वैदिक देवताओं की कही गयी है। प्रत्येक देवता की विभिन्न कोटियों की दृष्टि से तैंतीस करोड़ संख्या लोक-व्यवहार में प्रचलित हो गयी| कुछ विद्वानों के कथनानुसार आकाश में तैंतीस करोड़ तारे हैं, उन्हें ही तैंतीस करोड़ देवता कहते हैं।

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